~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

Quill pen, inkwell and open manuscript pages

NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

अमृत सब लिखते हैं मैं भी लिखता हूँ मगर जहर

अमृत सब लिखते हैं मैं भी लिखता हूँ मगर जहर

अमृत सब लिखते हैं मैं लिखता हूँ पर जहर!

अमृत सब लिखते हैं
मैं गरल लिखता हूँ
क्योकि देव अमृत पिये पिये शिव गरल
ओर धरे एक बड़ी सिख की अमृत पीना सब चाहते
पीना न चाहता कोई विष ओर जो पी जाय बन जाता आशुतोष शिव
धर्म उसने बहुत लिखा
चलो मैं धर्म लिखता हूँ
पर उनकी तरह सिद्धांत वाला नहीं
मैं व्यवहारिक तल पर निभाने वाला धर्म लिखता हूँ
चलो बहुत हुवा प्यार- व्यार
बहुत उसने लिखा है ये मल्हार
नही मैं नहीं लिखता इसे मल्हार
जो सिर्फ बसन्त में गूंजता है
मैं लिखता हूँ इसे सदा बहार जो जीवनभर फलता-फूटता है
वो रुतवा लिखता है रसुखि भजता है
नही मैं चाटूकारिता नहीं लिखता
मैं परते उधड़ साफ़ पाक लिखता हूँ
मैं लिखता हूँ उसकी सभ्यता-संस्कृति
मैं उसकी खुद्दारी-वफादारी ,ईमान धरम लिखता हूँ
मैं आदमी नहीं इंसान हूँ
धरती पर ही स्वर्ग रमे मैं ऐसा खेल व्यवहार, रीति-रस्म ,नीति-देवत्व लिखता हूँ
मैं नफरते लिखता हूँ जिसने मानव को रुलाया है
क्योकि समझे सुने वो आर्तनाद
की मैं रावण लिखता हूँ
क्यो क्योकि तभी श्रीराम का महात्म्य समझ आता है
की फिर रावण मर जाता है
ओर विभीषण समा में रम जाता है
की देखे दर्पण हर आदमी
ओर सच्चा बन जाय वाकई जहां
बस है यही आह ओर आरजू की
सिद्धान्त में तो सदियों से है लेकिन
धरातल पर भी ये खरा हो जाय मैं वो कलाम लिखता हूँ
की बस वसुधैव कुटुंब, शांति-सुख, वैभव सौहार्द्र बस जाए मैं वो खुदाई लिखता हूँ !
*nk सनातन