“इक विचार कोंधता सा !”
“इक विचार कोंधता सा ”
कोई साधारण लेखक-कवि कुछ असाधारण लिख ले लेकिन वह विषय -वस्तु साधारण ही बनी रहती है क्योकिउसे पढ़ा नही गया है, क्योक़ि उसे एक साधारण कवि -लेखक समझ नज़र अंदाज़ किया है लेकिन उस विषय को भाग्यवश या दुर्घटनावश कोई असाधारण व्यक्ति पढ़ लेता है और साफगोई से प्रशंसा कर ले तो उस साधारण शख्स का कद बढ़ जाता और विस्वास बढ़ जाता है। सभी असाधारण व्यक्ति साधारण को पढ़ना पसंद करते हैं क्योकि उन्हें पता है की साधारण व्यक्ति कोई असाधारण बात लिख सकता है और वे येभी जानते हैं की कभी वो भी साधारण शख्स था। हर असाधारण व्यक्ति उस साधारण में कुछ असाधारण ढूंढता है और उस साधारण को विशेस बनाने के लिए। वेसे असाधारण असाधारण ही लिखते हैं लेकिन कभी कभार वो “साधारण” भी लिख ले तो लोगो को विशेष लगता है क्योकि उस शख्स की वो महान छवि उसके मन- मस्तिष्क में निवसित है । हालाकि वह विशेष लेखक जानता है की वे साधारण या मामूली है लेकिन कोई भी लेखक ये हिम्मत या हिमाकत नही करता -की भई देखो तो सही मेने लिखा तो महान हो गया नही भई ये चश्मा उतारो सोचो मनन करो और साहस करो की मेने साधारण लिखा है। हां आलोचक -समालोचक जरुर ये काम करते हैं।
आपने देखा है महानता और गुणवत्ता में गहन फर्क है । जो महान है जरुरी नही की वो वाकई महान है क्योकि हम जानते हैं उस पर महानता लाद दी गयी है । और उस अवसर ने उसे महान बनाया। लाल बहादुर
शास्त्रीजी की अचानक मौत ने इंदिराजी को मौका दिया अगर ऐसा नही होता तो प्रतिभा के बावजूद वो प्रकाशमान न हो पाती और भारत रत्न न बन पाती । राजीव गांधी जी के साथ भी यही हुवा। उन्हें अवसर मिला क्योकि उच्च परिवार से थे । और संवेदनाओं और परिस्तिथि के आगोश में उन्हें देश का सर्वोच्च प्रजातांत्रिक पद मिला।
हमने देखा की -इक फुहड गीत ‘कोलावारी कोलाबरी ‘को महान नहीं तो हिट बना दिया रातो रात यानी हिट को महान मानने का रिवाज़ है ।
फिर इसके लिए अपना नज़रिया अपने ही पैमाने आज हनी सिंह महान माना जाता है नव पीढ़ी द्वारा और मोहम्मद रफ़ी को साधारण। क्यों क्योकि वो नादाँ हैं और फिर अपनी प्रवत्ति भेड़ प्रवत्ति ।सूअर कीचड़ पसंद करता है कोआ गंदगी तो ये उनका मिजाज़ है और अपना अपना आंकलन है।