कोराना महामारी ओर लॉकडाउन !
Lockdown–Acceptence & Negligence Acceptance
लोकड़ाऊन बोझ लग रहा है उबाऊ लग रहा है
सरकार का शोख़ी नहीं विवशता है
कोरोना19 एक महामारी ओर लाइलाज़ बीमारी
ओर इससे ऊपर साइलेंट एफेक्टेड यानी मूक संक्रमण
विडंबना ये की लोग घरों में कुलबुला रहे हैं
वो बाहर सड़को ओर काम पर आना चाहते हैं
लेकिन हम तो डूबे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे
बस यही सकंट भारी
इलाज़ हैं पर सटीक नहीं बस घर मे रहे ही कारगर उपाय
लेकिन चलो–
लोकडॉन खोल दे सरकार
लेकिन सलाह की घर पर रहना बेहतर
ओर रुग्ण होने पर न हॉस्पिटल इलाज़
फिर देखे लोग बेतहाशा निकलेंगे
ओर संक्रमण फैलेगा
ओर लाशों के ढेर लगेंगे
ओर फिर सरकार को कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी
की लोकड़ाउन घर मे रहे
लोग स्वतः सबक लेकर
हाँ सबक लेकर घर पर ही रहेंगे
ये ठीक वैसे होगा जैसे–
एक शिशु
बार बार दीपक की तरफ लपकता है
बाप -माँ रोकते हैं
वह बार बार लपकता है
ओर दम्पत्ती लाडले को रोकते हैं
लाडला रोता है लपकने के लिए
इस बार पिताश्री छोड़ देते हैं
वो घुटनों के बल भाग लपकता है
की बढ़िया चीज़ है
माता-पिता यू ही रोक रहे हैं
लेकिन लपक बालक रोता है उसकी हथेली जल जाती है
अब जब दीपक फिर जल रहा है
पिता उसे धकेलते हैं उसे दीपक की तरफ..
लेकिन वो नहीं जाता लपकने की बात तो दूर
उस तरफ वो देखता ही नहीं
लेकिन यहां हम बच्चे नहीं है
अपना दुसरो का भला-बुरा अच्छी तरह समझते हैं
लेकिन अब जो नहीं माने
लेकिन मरे ओर अपनो को भी मारे
इससे कई मरेंगे वो जो खुदगर्ज हैं बेगरत लापरवाह हैं
ओर निर्दोष समझदार भी मारे जाएंगे
क्योकि आखिर हम सब एक दूजे के आस-पास ही तो रहते हैं
ओर एक दूजे के पूरक हैं
फिर सोच का विषय की क्या करे
इलाज ढूंढने तक हम मजबूर हैं
गरीब बिन नॉकरी पेशा दिहाड़ी मजदूर
आखिर कैसे जिये
सरकार, स्वयंसेवी संस्थाएं, जिम्मेदार लोग उन्हें मदद पहुचाये
ये भी एक चुनौती…
इसलिए लोकड़ाउन ही विकल्प
इसमें सरकार पहुचाये खुद जरूरत की वस्तु
ओर कहे नैतिकता का वास्ता दे कि जब कोरोना खत्म होगा
आप काम पर लौटेंगे
कमाएंगे तब स्वतः सरकार को चुकाना
ये ठीक वैसे जैसे
बैंक एक विद्यार्थी को ऋण देती है
ओर नोकरी लगने पर रिकवरी करती है
*nk सेवक “सनातन”