गायकी मेरी मेरा जहन ऐ सुकून !

गीत गाता हूँ अपने सुंकु किसी ओर को भी दे जाय मेरी खुशकिस्मती !
गीत गाना मेरा पहला शौक रहा है
गाता हूँ मैं पाक-साफ तरन्नुम में
सुरमयी लगे किसी को,
किसी को बेसुरा
गाता हूँ मैं अपने राग अपनी धुन
कोई फ़र्क नहीं पड़ता
क्यो क्योंकि मैं कोई पार्श्व गायक नहीं,
ओर गायकी मेरा पेशा नहीं
मेरा गीत किसी की तर्ज नही
मेरा गीत मेरा सिर्फ मेरा मर्ज़ है
ये मेरी शिफ़ा है ,वफ़ा है
सिर्फ शौक़ हैं और कुछ नहीं
बाज़ार में बिकने वाली आवाज़ें
सिर्फ़ व्योपारी हैं
लेकीन वो आवाज़े उस किरदार में उतरती हैं
ओर डूब के गाती हैं
ओर गर वो आपके दिल की लगी है
तो छू के निकलती है जिगर के पार
ओर उसके गम उसकी वबा उसकी खुशी
सुकु देती है तब जब वो अपनी आवाज
ओर दिल की लगी और दीप की जली होती है
लिखता हूँ मैं पुर सुकून से
जब से “सनातन”समझा हूँ
हर काल मे हो सनातन
वो आह वो वाह लिखता हूँ
एक आम आदमी की आवाज़
रईसी का तड़का भी
स्वाद भी सब तरह के
बस सब्जबाग ही सही
दिखाता नहीं देखता हूँ
कह दु की लिख के जीना सीखा है
रोज़ी नहीं स्वान्त सुख भी बन जाए अपना
क्या बिगड़ता है किसी का
अपन को तो स्वर्ग मिलता है धरती पर जीते जी “सनातन” ये
क्या कम है !
*”NK सेवक “सनातन”