~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

मजदूर का कोई रूप-रंग नहीं होता!

“अनिद्ध्या- सावन,बसन्त ओर सौंधी मिट्टी का युग्मक”
{ दो बेहद खूबसूरत ग्राम्य बालाएं जो पारम्परिक वेशभूषा में रोज निकलती हैं दिहाड़ी पर…. तरस आता है उनके भाग्य पर लेकिन… .पर कुछ कौंधती पंक्तियां }

अल्हड़ सा मदमाता यौवन ओर ऊपर से रूपांगना भरपूर
की खुद कुदरत ने ढाला हो , ले कलाकार की छेनी हो मगरूर

घने मेघो से फूटते बला सी मेनका के मदमाते हुस्नई सुर
ओर प्रणय- काम से लहराते जलवों में तरवरी इन्द्रलोकिय हूर

चले हैं निश्छल, बिंदास जज्बा ऐ नूर जिस्मानी लेकर
हैं भौतिक जिंदगी के पचड़े लिए पापी पेट के गुर

राजबालाये ,हूर सी कमनीय, हैं राहे तन मटमैली करने शाम बेकसूर
निवाले होंगे शाम को होगा सबसे बड़ा दिली सुकून

रोज़ चांदमई और लालिमाई सुरज सा लौटना
ओर न थकान न कल की परवाह फिर शाम में रम जाना

उन्हें ना है अहसास अपनी खूबसूरती का
ओर गर है-2 तो कोई गुरुर कोई गुमाँ नहीं

ईश्वर से भी अपनी पैदाइशी का कोई शिकवा नहीं
की मजदूर के घर पैदा किया, ये तू तेरा फैसला सही,
रईसी हो या के राजसी सुंदर सुकुमारी बाला
मजबूर ओर मजदूरों की आखिर कोई जात नही जाने जमाना

मेहनत कश के आगे फ़ीके हैं सब श्रृंगार ओर सौंदर्य ओर झंकृत यौवन हाला
सारे नशे काफूर बस सच्ची यौवन -रूप की मधुशाला

ईश्वर के इस न्याय पर अन्याय कहूँ
के कहूँ -2 वाह रे सर्वेश्वर तेरी अज़ब माया
तेरी कायनात में जल कर ही बनता मधुरस
देव भी तरसते मद के प्यालों में खोते रस-रस

*nk सेवक “सनातन”

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