मुफ्तखोरी ओर महान भारत !

” मुफ्तखोरी ओर महान भारत”
( कवि सम्मेलनों के बे-टिकिट बेदाम आयोजन पर एक नजर ओर महत्व)
कवि सम्मेलनन सामाजिक, औद्योगिक संस्थाओं द्वारा कवियों को मानदेय चुका आयोजित किये जाते हैं जिसमे पास सिस्टम से समाज से सम्बद्ध तबका ओर अन्य पहुंच वाले लोग कवि सम्मेलन में पहुंचते हैं। कवि सम्मेलन में जो लोग आते हैं क्या वो वाकई श्रोता ही होते हैं ? नही ओर यदि हाँ तो उसकी पहचान सिर्फ टिकिट निर्धारण द्वारा ही आंका जा सकता है और कविता और कवि के महत्व के लिए ये प्रथा पुनः शुरू की जानी चाहिए। जो वास्तविक काव्य रसिक है वो किसी भी कीमत पर आएंगे ही।
यदि कविता और काव्य के महत्व को ऊंचाइयां देनी है तो ये रीत अपनानी ही चाहिए।
मुफ्त की चीजों का स्वाद नही आता यदि धन दे के चीजो को खरीदा जाय तो आनन्द आता है क्योकि आपके जहन में है तभी उसी चीज को आप खरीद रहे हैं और यदि चीज पसन्द -ना पसंद पर उसकी गुणवत्ता का मूल्यांकन करते हैं और चीजे परोसने वाले भी अपनी गुणवत्ता बढ़ाते हैं यदि उन्हें बाजार और प्रशंसको के दिल मे रहना है और पुनः सुनने को आतुर रखना है और अपनी लोकप्रियता कायम रखनी है।
*NK Sevak ‘sanatan”