“मेरे दर्शन के सुर”
“मेरे दर्शन के सुर”
*” जिन्दा रहने के लिए आदमी समझोता करता है और आदमी अपने असली चहरे चेहरे पर नकली चेहरा या मुखौटा मढ़ (लगा) बिना आईने के जीवन जीता है।”
*”सुन्दरता ठीक ऐसे ही बुध्धिमता किसी के बाप की बपोती नही वह प्राकृतिक रूप से किसी को भी उपहार स्वरुप मिलती है।”
*”कुशलता अभ्यास क्रम से आती है और वो भी किसी के बाप की विरासत नही ; कोई भी इसे अपने हुन्नर और जूनून से प्राप्त कर सकता है।”
*” शिक्षा से बुध्धि का क्रमिक विकास होता है और विभिन्न चरणों -सोपानो के अंतर्गत ज्ञान बढ़ता है।”
*”ज्ञान असीमित है और मनुष्य सोच भी लेकिन कई मुद्दों पर सिमित और इक व्यक्ति सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नही कर सकता क्योकि उसकी क्षमता और सीमा सिमित है!”
*” किताबी ज्ञान से दंभ आता है जबकि सच्चे ज्ञान से विद्वता और शालीनता और सभ्यता तीनो!”
*” अनुभव शिक्षा से कही ऊपर है इससे व्यक्ति अनन्य विषयो का ज्ञाता
खुद ब खुद बनता है जेसे दर्शन मनोविज्ञान अर्थशास्त्र धर्म शास्त्र और सारे घोषित अघोषित शास्त्र।”
*”सोने की स्याही हो हीरे की कलम हो और प्लेटिनम का पेपर हो
जिस पर साहित्य को उकेरा जाय क्योकि ये अनमोल निधि है इस चराचर जगत की जिसे अनमोल धातु पर ही उडेला जाय जिससे वर्तमान में ये धरोहर कागज़ में नही सड़े दीमक से मिट्टी गर्द से न गंदालाये और वातावरण हवा पानी सेंध आर्द्रता से अप्रभावित रहे और इन सबसे ऊपर
लोग इसे समय समय पर रद्दी में न फेके और कीमती आभूषण की तरह
संभाल के रखे पीढ़ी दर पीढ़ी।”
*****NK Sevak “Sanatan”