मैं कवि : मैं जानता हूं ये कविता नहीं

*जो सुनाया अब तक व्यावसायिक था अब असल मर कविता सुनो ! “कुछ कवि सम्मेलनों में मैने कुछ कवियों की आह सुनी — की जो अब तक सुनाया वो श्रोताओं आपके लिए ओर आयोजको के लिए था जो कविता न थी इधर-उधर का जोड़-तोड़ था। अब मैं अपने लिए एक कविता पढूंगा जो मेरे है कविता के लिए है नहीं तो मेरा कवित्व मुझे कोसेगा। मुझे पता है आप इस कविता को सुनना पसंद नही करोगे। लेकिन कविधर्म तो मुझे निभाना है। तो सिर्फ 5 मिनिट शुद्ध कविता के नाम। आप झेले -सुने आपका धर्म। अब तक जो सुना क्षणिक ठहाकों-कहकहों में हवा हो जाएगा लेकिन ये अगर आपने सुना तो दिल मे उतरेगा मन-मस्तिष्क को उद्देलित ओर झंकृत करेगा…
*NK सेवक “सनातन ‘