मैं राजनेता मेरी चाह की पद होऊ तभी मरु !!!!!
हर राजनेता नेता की चाह की वो सत्ता के पद पे ही नर्कवासी हो!!
जी हाँ हर राजनेता चाहता हैं कि उसकी पार्टी और वह सत्ता में आये और ताजीवन बना रहे । राजनीति की सब से बड़ी बात की इंसमे रिटायरमेंट की कोई तय उम्र नही है! वो अलग बात है कि आजकल युवाओं को ही राजनीति बनाये रखने का चलन हो गया है।।लेकिन राजनीति क्षेत्र में युवा की उम्र कम से कम 65 से सुरु होती है । ठीक है कुछ 70 से ऊपर वालो का राजनीतिक करियर इरादतन खत्म कर दिया गया है और ये स्वस्थ परम्परा स्वयंम के लिये लागू कर रिटायर्ड हो लेंगे। अब लोकतंत्र में विपक्ष के नेता भी वही रुतबा रखते हैं और पक्ष वाले भी उनका सम्मान करते हैं क्योकि राजनीति ऊँट की तरह है कभी इस करवट कभी इस करवट यानी पक्ष विपक्ष ओर विपक्ष कब पक्ष हो जाय कह नही सकते। इसलिए राजनीति क्षेत्र में बदले की प्रथा नही होती। हां तू तू मैं मैं अपशब्द या अपशिष्ट या अशिष्ट भाषा का प्रगोग भले ही कर ले मतदाताओं को प्रभावित करने लेकिन संसद में पक्ष के सिरमौर का विपक्ष के सिरमौर का पैर छूना या आशीर्वाद लेने की स्वस्थ रंगासियारी प्रथा है।
मैं जिस बात को इंगित कर रहा हूँ वो यही की राजनेता सत्ता पद पर ही मरना चाहता है कारण कई है कुछ प्रत्यक्ष कुछ अप्रत्यक्ष जिनमें प्रमुख गिने तो राजकीय सम्मान,फिर पक्ष विपक्ष के नेता और दल पक्षधर भी न चाहते हुवे शरीक होते है क्योकि जाने कब कैसे कहा इसका लाभ मिल जाये, अन्य सारे पदेंन लाभ ,फिर सबसे बड़ा यह कि मृत्यु पश्च कोई याद में स्मारक, गार्डन,गली,नाली,स्कूल और योजना का नाम भी रखने के पूरे अवसर।
अतएव प्रत्येक राजनेता 90 का भी हो राजनीति में सक्रिय रहता है और ज्यादा रहता है क्योकि मृत्यु आने के अवसर इस उम्र में शत प्रतिशत रहते हैं।
तो देशजनो जय राजनीति ओर जय राजनेता गण ।
*NK सेवक “सनातन”