‘ मै बीमार होना चाहता हूँ !!!!!!!!”
“हां मै बीमार होना चाहता हूँ !”
हाँ मै बीमार होना चाहता हूँ। हँसो मत -पूछो क्यों
क्योकि मै दोस्तों को आजमाना चाहता हूँ
हां मै बीमार होना चाहता हूँ
हां चौको मत -पूछो क्यों
क्योकि मै कुछ अपने बने पड़े हैं
हां को आजमाना चाहता हु
हां मै बीमार होना चाहता हूँ
सोचो मत -पूछो क्यों
क्योकि मै कोन है अपना कोन है पराया
हां जानना -परखना चाहता हूँ
यु तो कई यारो के यार हैं कहते फिरते हैं
यु तो कई शुभचिंतक बने फिरते हैं
मै बीमार होना चाहता हूँ
आग की भट्टी में मै उन्हें तोलना चाहता हूँ
हैं तो सब कहते हैं हूँ वाकई हैं क्या
नही हो तो-तो पल्ला झाड़ने मुह मोड़ने का
हां भोतिक दस्तूर दुनिया का जानना चाहता हूँ
“सनातन” तू अब तलक क्यू बना फिरा है प्राकतिक
ज़माना कितना है शातिर, बन तू भी आधुनिक
पहचान ए नादा तर्ज इस जालिम बेदर्द जमाने की
मत कर चिंता अगले जन्म मोक्ष और स्वर्ग की
क्यों क्योकि स्वर्ग -मोक्ष -अगला जन्म किसने देखा
जो जिया यही जिया , बन जा तू भी ज़रा भोतिक
अपना वही राग भेर वि और आसुरी
तब इस चराचर जगत की सब शक्तियाँ
हां होंगी तेरे मानिंद आधीन पराधीन
और तुभी भोगेगा – इसी धरा पर
आहा हां खुशहाल स्वर्ग की पूंजी।।।
**nk सनातन