~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

यू तो हम बदलते हैं पर यू नहीं !

कैलेंडर-पंचांग बदले क्या हम भी बदले जरा सा भी
कुछ नहीं बदला सिर्फ केलेंडरर बदले हैं कहने वाले ऐ मुसाफिर
गिनती के इस खेल में पूरा एक साल घटा है जिंदगी का
गिनती ने ही जहां को इतना विषैला बनाया है
कहूं नशीला-सजीला – वनीला भी बनाया है
पर सच यही गिनती के इस खेल में गवाया बहुत है
गिनती ने अस्तित्व के साल गिनाए हैं
वही अस्तित्व के रहे साल में सुझाये हैं
बस”सनातन” घटना या के ह्रास ही दुनियावी सच
बढ़ना तो अपनी गिनती का झूठा सच
गिनती -शिन्ति के खेल में कौन बढ़ा है मौत से आगे
महापुरुष-अमर चरित्र नाम में लेकिन गाहे-बगाहे
बस इस सभ्यता के अंत तक हैं अमर ये कुछ नाम
सिर्फ़ पांच हज़ार पुराने तथ्य ही हैं ज्ञात
जिसमे भी अंग्रेजी के कई ifs ओर buts हैं
कौन था उन सालों में जो कहा गया है माने
हकीकत के दावे आज भी की नहीं करता
चाहे ले विज्ञान, इतिहास-भूगोल के मायने
लेकिन चलो बढ़ने के भ्रम में हम सब सुकु से जी रहे
मरना तो तय है अब आये तब आये कब आये
कहना आसान लेकिन आये तो सबको कम्पकपाये
जिंदगी खूबसूरत दुःख हो चाहे सुख
ये हँसाये ये रुलाये समय- समय के साये
केलेंडर क्या है आदमी का रचाया गणना का एक खेल
जिसमे सब तय है जनवरी से ठेठ दिसम्बर
जिंदगी के आईने में जनवरी के बाद फरवरी आती है
फिर मार्च से दिसम्बर ओर फिर नया केलेंडर
ओर मौत के खेल में दिसबंर नहीं आता
आता है तो मरने वाला कहां देख पाता
अगर दर्शन की चासनी में भिगो “सनातन” कहे
मौत जिंदगी की मीठी हकीकत बाद इसके दर्द नहीं रहते
क्योकि हम सांसारि नहीं स्वर्ग की शख्सियत हो जाते
जिंदगी ज़हरलि हकीकत मिठास के नाम कई कीड़े
जीते कहां हैं हम जीना जिसे कहते हैं
बस कर्तव्यों -नियमों में बंधे सब उठते -जगते-सोते
बस सुखी नींद-नींद की चाह -आह में सब
सत्यम शिवम सुन्दरम की कहाँ किसमे हुक
चारो तरफ रोटी -कपड़ा-मकान में ऐशो की भूख।
लेकिन चलो हम जीते हैं और एक दिन रुखसत
बस मूल्यांकन छोड़ जाते हैं और शरीर छूटते ही
दुनिया का कड़वा सच सब अच्छे बन जाते हैं
क्या कमाया क्या गवाया गिनती दुनिया
हम तो सब स्वर्गीय -जन्नती हो परमधाम पा जाते हैं।
*2019 के छूटते -टूटते लम्हो की यही कहानी है
2020 के आगाज़ का सफर हो यही जन्नती
क्या पता उसके हिसाब-किताब में दोजख या जन्नत
चलो 2020 में सिर्फ अच्छाइयों के ही लिखे
बैलेंस शीट बने जब भी क्रेडिट अककॉउंट में हों पूण्य ही पूण्य
डेबिट खाते में में हो बिल्कुल शून्य ही शून्य।
*NK सेवक “सनातन”