लिंग : नर-मादा भेद का जुदा-जुदा आईना !

लिंग एक पर मायने अलग-अलग*
गायों की दुनिया मे मानव समाज सिर्फ मादा ही चाहता है और जश्न मनाया जाता है जब कोई गाय बछिया देती है क्योकि वह आय का बृहद स्त्रोत होती है वयस्क गाय होकर । लेकिन नर गाय या बैल या नन्दी जो बड़ा हो हल जोतने के काम आता है लेकिन फसल चार माह में पकती है और बैल की जरूरत वर्षभर में सिर्फ दो तीन बार ही पड़ती है और उस दौरान उसका चारा-पानी खर्च भारी पड़ता है…अतः कई मालिक लोग अमानवीय कृत्य करते हैं वो ये की उन्हें खुला छोड़ देते हैं ,उन्हें चारा-पानी नहीं देते और कुछ तो उन्हें कसाई को बेच देते हैं। जबकि नंदी को भी भारतीय पुराणों में वही पुजनिय स्थान है । जहां हर गाय को कामधेनु ओर नन्दीनि का दर्जा प्राप्त है वही भगवान शंकर का वाहन नन्दीश्वर पूजनीय है और हर बैल उन्ही का रूप माना जाता है। लेकिन ट्रैक्टर के आविष्कार ओर उपयोग ने बैल का महत्व कम कर दिया है ।अब वह न बैलगाडी में हांका जाता है ,न फसल की छूटाई में।अब इसका उपयोग महज प्रजनन के लिए ही रह गया है वो भी कृतिम गर्भादान प्रक्रिया ने गाय-बैल का प्राकृतिक सुख भी मानव ने छीन किया है उत्तम किस्म की नस्ल के फेर में ।
ठीक उसी तरह वेश्या बाजार में मादा पैदा होते ही जश्न मनाया जाता है…. जबकि आम समाज मे नर बालक पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है…मादा बालक का पैदा होना … लक्ष्मी पैदा होना अप्रत्यक्ष रूप से एक ताना ही ही है और 100 दंपत्तियों का नार्को टेस्ट हो तो प्रथमेव 100 ही 100 लड़का ही चाहते हैं साबित हो जाएगा…बस लड़कीं पैदा होने का विचार आज भी छद्म मानसिकता लिए हुवे है भारतीय समाज मे।
लेकिन आधुनिक युग मे शिक्षा के प्रसार ओर प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली से सबको समान अवसर की तर्ज पर लिंग भेद खत्म हुवा है। आज स्त्री शशक्त माध्य है अपनी शिक्षा और काबिलियत के दम पर। अब वह मातृ उपभोग की विषय वस्तु नहीं है जैसा कि मध्यकाल में दृश्य था। आज वो केवल गृहिणी भी नही रही वरन हरफ़नमौला पुरुष के समकक्ष परिलक्षित छवि लिए हुवे है।
*nk सेवक ”सनातन”