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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अपराध है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अपराध है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अपराध है !
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता -2
की जरूरत सबसे ज्यादा
है तो धार्मिक,सामुदायिक,
राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में ही हैं
मगर अफ़सोस -3 आधुकीक़ समाज ज्ञान के क्रम में
हाँ ज्ञान के क्रम में ज्यादा संकीर्ण, दकियानूसी हो गया हैं !!!!
और सभ्यता के क्रम में-
असभ्य ज्यादा क्रूर भी हो गया है
और इस लिहाफ़ में सच्ची अभिव्यक्ति -2
एक बड़ा गुनाह हो गया है !!!!!!
आजादी के नाम लोकतंत्र के धाम
आजाद सब है पर वाकई आजाद कोई नहीं है
कही कर्तव्यों के नाम अघोषित दायरे है
ऐसे में स्वतंत्रता के सीमित मायने हैं
सुधार हो सब चाहते हैं
लेकिन सब के अपने -अपने सधे और साधे हुवे मायने हैं !!!
राजा राममोहन राय ,स्वामी दयानंद सरस्वती,महात्मा गांधी,अब्दुल बारी,
सर सैय्यद अहमद खान,स्वामी रामानंद, बिपिनचंद्र पाल,विवेकानन्द महान
महादेव गोबिंद रानाडे, बंकिमचंद्र चैटर्जी, विनोबा भावे महान मुंशी प्रेमचंद
बाबा आम्टे ,डॉ भीमराव अंबेडकर ज्योतिबा फुले,नारायण गुरु,धोन्दो केशव कार्वे, ईश्वर चंद्र विद्यासागर महा मनीषी-
ने जो समाज सुधार किए
और तत्कालीन परिस्थितियों में विरोध भी कई हुवे
मगर विरोध के बाद शने शने
और अंततः सुधार होते गए
हां स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह,अंतरजातीय विवाह,गंधर्व विवाह,तलाक, छुआछूत या अस्पशयता , अंधविश्वासी कर्मकांड के द्वन्दों और दंशों को लगभग पाट दिया गया है
बगैर अभिव्यक्ति की निजता और आजादी के ये कैसे सम्भव होता
सोचकर सोचने का गहन और गम्भीर मसला है
कुछ वैश्विक क्षितिज पर भी नज़र डाल ली जाय
ब्रूनो,कोपरनिकस, गेलिलियो ,ईसा मसीह ने धार्मिकता और आध्यात्मिक अन्धता में झकड़े विचारों का पुरजोर विरोध किया
और इसे ईश निंदा,धर्म के विद्रोही करार दे के
धर्म क्षेत्र के ठेकेदारों ने-2
मौत का ईनाम दिया
की ये समाज के दुश्मन ईश्वर के विद्रोही हैं
ऐसे ही दासप्रथा के अग्रज अब्राहम लिंकन को भी
मौत के घाट उतार दिया
यानी समाज सुधार, धर्म सुधार
एक गुनाह है
लेकिन बाद वो कथन सत्य पाए जाते हैं
और ये दुनिया जो बदली है उसी का सिला है
वेसे विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता
यानी असल मे ये ईश्वर के प्रति सबसे बड़ा गुनहगार है
लेकिन बदला विश्व का अद्यतन रूप जो है
अफ़सोस सब विज्ञान का ही विस्मित चमत्कृत आईना है
क्या ये विज्ञान ईश निंदा और अविश्वास के लिए
सबसे बड़ा अपराधी नही
हे धर्म के ठेकेदारों यदि हाँ
तो दो उसे सजा
और त्याग दो सब सुविधा जो उसने सहज आम कर दिया है!!!!
*nk सेवक ”सनातन”