अमन्चिय कवि,उनका उच्च सृजन ओर व्यथा !

दूसरा काव्य सृजन समाज ओर उसकी व्यथा
कई साहित्यिक संगठन हैं देश मे
ओर कई स्थापित ओर नव सृजनकार
हाँ नवसृजन कर्ता लेकर अपना सूजन
मंच पाते हैं लेकिन बन्द कमरों में
हां छोटी-मोटी काव्य गोष्ठियों में
काव्य मण्डलियों ओर काव्य-रस मंझरियो में
वहाँ की खासियत या के कमी व्यथा -कुंठा
हाँ ग्लानि -तड़प-वेदना ,शिकवा -शिकायत
हां यही की वहां कवि खुद श्रोता दूसरे कवियों का
ओर अपनी बारी का इंतज़ार इंतज़ार
तब तक आपको चाहे अनचाहे देनी है दाद
वाह वाह क्या बात है और गजब जिंदाबाद
माशाअल्लाह सुभान अल्लाह काबिल ऐ दाद
ओर पूरा समां सारा माहौल रोशन हर्षित मुदित
ओर शुरू होती है इसी दाद ऐ पानी से
हाँ होसलो की उड़ान फिर ऊची उड़ान
इंसमे कोई तीतर बन रहा जाता है
कोई गिद्ध तो कोई बाज कोई कठफोड़वा
तो कोई कोयल कोई कौआ
कोई मोर तो कोई बुलबुल ओर गुल
कुल मिला कर कुछ स्याह कुछ उजली बात
कवि समाज कई तरह का है
कुछ ने कोई उद्देश्य अपना लिया है
कोई मूल उद्देश्य से तर हैं लेकिन व्यावसायिक रूपेण पिछड़ा
कोई उद्देश्य से भटका लेकिन चिरौरी उसका गुण
चिरौरी कह रहा हु चापलूसी नहीं
क्यो की चिरौरी एक शालीन सभ्रांत शब्द
बात जब व्यवसाय की तो मंचीय कवि उभरते है
उस रंग के बड़े नाम हरिवंशराय काका हाथरसी पंथ निराला
हरिऔध प्रदीप ओर गोपालदास “प्रदीप”
उनके ओज से उन्नत रहा काव्य ओर कविता
उनका उद्देश्य केवल नहीं था मनोरंजक ओर ठहाका
स्वस्थ मनोरंजन और कालजयी शिक्षा
समाज बदले मानसिकता सुधरे चलचित्र सा आईना
मगर आज परिवेश के साथ परिदृश्य भी बदला
भैतिक चाह ओर भौतिक कुंठा
विकृत मनोवृत्ति ओर बिगड़ा बिगड़ा चेहरा
नैतिकता पहले कितनी थी नहीं पता
वैसे तो थोड़ी थी यदि महाभारत उठाये
क्योकि सो कौरव ओर मात्र पांच ही पांडव
फिर महान गुरु द्रोण कृपाचार्य ओर सिरमौर भीष्म
सब निष्क्रिय चरित्र जब आई बात नारी लज्जा बचाने की बात
ऐसे उसूल ऐसे प्रणो पर हैं ढेरो सवाल
रामायण और महान आदर्श ओर पुरुषोत्तम की भी थी बात
आदर्शो में कोई निर्दोष पिल पिल जाए
आह ये हैं कोरी निरी फूटी काली बात
दूध का दूध और पानी का पानी हो।
हाँ तभी कहलाता सच्चा आदर्श भली बात
लेकिन इन सब मुद्दों को उठा -2 पटकने कोसने वाला
खुद बिकाऊ हो गया यू कहे पदच्युत हो गया
छंद अलंकार रूपक समास लय ताल तुक में लिखना
फिर उन्नत या प्रांजल भाषा मे लिखना
कलिष्ट या ऊँचे शब्द प्रयोग ओर पेचीदा मुहावरे
हाँ में लिखना एक रिवाज़ था एक चलन
तब समाज सुसंस्कृत था तो उसे कहा उसकी जरूरत
बात मनोरंजन की तो वो सिर्फ तेनालीराम ओर बीरबल में संभव
कालिदास पढ़े या मुद्रा राक्षस या कल्हण
उसमे मनन मनन मंथन बस कहा मनोरंजन
साहित्य कोई मनोरंजन की वस्तु नही
हाँ उसके लिए हंसोड़ ओर मशखरे
ओर लतीफे व्यंग्य नहीं क्योकि व्यंग्य हर कोई समझे
हर किसी के बस की बात नहीं औकात नहीं
अब कविता की किसको जरूरत
प्रबुद्ध समाज या कम पढ या अपढ़ समाज को
प्रबुद्ध को ज्ञान नही लेकिन नैतिकता जरूरी
क्योंकि जो प्रबुद्ध हो नैतिक भी हो जरूरी नही
रावण की मिसाल इस कड़ी मे बेमिसाल
तो उन्हें चाहिए सिर्फ हल्का मनोरंजन
कम पढ़ सरल कविता समझ लेगा
क्योकी लोगो ने तुलसी रामायण को ज्यादा समझा
वाल्मीकि रामायण को कम
क्योकि एक देहात या क्षेत्रीय दूसरी कठिन और कुलीन वर्गीय
अंत मे हालांकि अंत नहीँ
जिसको अंग्रेजी में कहते है
लास्ट बट नॉट द लिस्ट
ये कवि समाज कविता में बड़ी बड़ी बातें करता है
नैतिकता ,सामाजिकता ,समता या समानता की
ओर वह दुनिया बदलने को आतुर है
लगता है भगवान का प्रतिनिधि है
ओर वो सब कुछ बदलना चाहता है
लेकिन खुद बदलना नही चाहता
इसका छोटा सा उदाहरण दे दु
गोष्टि का समय 2 बजे दोपहर
बन्दा ठीक तीन बजे बाद आता है
गोष्ठी चल रही है और आयोजक दुनिया का सबसे मजबूर आदमी यहां बेचारा
करे क्या टोके तो कैसे ओर किसे
उन कवि महोदय से पूर्व जो आये हैं
वो ठीक समय पर यानी 3 बजे आये हैं
ओर पूरी गोष्ठी में बामुश्किल 10-12 कवि
इंसमे बेचारे दो तो आयोजक ही जो कवि हैं
यहां तक तो ठीक है जनाब लेकिन दो तीन महाकवि अपनी बारी आते ही पढ़ निकल लेते हैं
की कुछ काम है या फोन आ गया अगे रह वगे रह
ओर कुछ पठ्ठे तो पढ़ युही खिसक लेते हैं
ये सुदशा हैं हम कवि वृन्दो या समाज की
अवदशा नहीं कह रहा क्योकि मैं इस महान शब्द की तौहीन करना नहीं चाहता
*N K सेवक “सनातन “