◆ गनीमत है कि आँसु बहाने पर कोई रोक नहीं है ! ◆
सब पर रोक है
गर नही है तो आँसु बहाने पर
जब चादहो बहाओ
जितने चाहो बहाओ
जिस किसी के लिए बहाओ
आँसु बहाने के लिए अनेक कारण है
हँसी जीवन से गायब है
हँसी के नाम हैं तो बस कहकहे
भौतिक जीवन के आंसू
भौतिक ठहाके के व्यापार में तब्दील हो गए हैं
सुबह शाम पार्को के झीलों के दायें बाएं हा हा हा हा हा
ओर वहां कई लोग हैं जो जाते हैं
जो सांसारिक घेरे में हंसी भूल गए थे
यानी हंसी अब बिकाऊ हो गयी है
ठहाका गुरु ,हास्य गुरु
ठहाका योग आदि चलन में हैं
ओर लोग सशुल्क उसका निर्जीव ही सही
फीका, भ्रमित या भरमाया हुवा आनंद प्रयोजन के नाम ले रहे हैं
रोने के लिए कई कारण मौजूद हैं
निजी,सार्वजनिक, राजीकीय,अराजकीय, देशीय,वैश्विक
भौतिक साधन सुख दे रहे हैं
लेकिन उसके आँसु आंखों के अंदर इकठ्ठा हो रहे हैं
आँसु सस्ते ही रहे हैं हर दौर में
मुस्कान ओर खुशी पर अघोषित पाबंदी है
ओर निजता ओर उत्सवों पर अप्रत्यक्ष इमरजेंसी है
हालांकि कहने को सब कुछ हो रहा है
लेकिन हकीकत में स्वांग रचे जा रहे हैं
जनता मुगालते में है कि सब कुछ सही हो रहा है
लेकिन ये कस्तूरी मृग का रेगिस्तानी भ्रम अच्छा है
की पानी दिखाई दे रहा है
कस्तूरी की सुगंध आ रही है
लेकिन हाथ कुछ नही आता
लेकिन मायावी संसार मे ये भ्रम मजा देता है
बस ये ही काफ़ी है खैरियत के लिए!
*nk सनातन