उजाले किसके ?

उजाले किसके ?

◆!उजालो में अंधेरो की रोशनी !◆
!ये दिवाली दिवाली नहीं है
चारो तरफ है अंधेरा ही अंधेरा
चिरागों में वो रोशनी नहीं है
ये दिवाली……….
दीपकों के उजाले हैं मगर
अमावस के घेरे किये हैं मद्धिम
आर्थिक तंगी ओर ऊपर से ये मंदी
तेल को तरसे हैं दीपक सारे
खुजली में खाज हाय कोरोना महामारी
जात है निजात नही
कराह ही कराह है कोरोना की मार है
रोशनी पर रोशनी नहीं है
ये दीवाली दीवाली नहीं है
शासन-प्रशासन रहा अदूरदर्शी
सगड़े काम वृहद पर रहते कमी
बस भ्रटाचार नीति ही रही महत्ती
कुछ कारगर कुछ नही
ये दिवाली है पर दीवाली नहीं
खुशियों के रंग दिखते जरूर हैं
पर वाकई दिखते हैं उतने नहीं हैं
इसीलिए तो कहता “सनातन”
की ये दिवाली दीवाली नहीं हैं
हुक्मरान सब एक ही ईंट के चट्टे-बट्टे
वोट के ही सगे-संबंधी सत्ता के भूखे
जनता कहां जनार्दन मतलब निकले की अनदेखे
शासन-सियासत की वेदी पर खरे नहीं उतरते
आजमा लो किसे भी दिखते देवता हैं
लेकिन दानवीय उनके धंधे-फंडे
इसीलिए तो कोसता “सनातन” लोकतंत्राई
ये दिवाली है पर दीवाली नही
माना सब तंत्रो से बेहतर एक प्रजातंत्र
लेकिन लिए है गहन खोखलाइ
बस सहने को मजबूर जनता अकुलाई
तब कहता “सनातन” की हो ये शाक्य-वैशाली
या फिर हो राजतरांत्र, पर राजा भलमनसाई
हाँ हो ये राजा बलि या राजा रामाई
तो फिर ”सनातन” तो क्या कोई नही कहेगा कि
की ये दीवाली नही है
कहेंगे तब सब हमसाज होकर
की वाह ये क्या खूब उजालो भरी रंगी रौशनाइ
है खुशहाल सबकी दीवाली-2
NK सेवक “सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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