उल्टासन : कोरोना काल !

बदकिस्मती के पैर नहीं होते*
(( कोरोना19 की लहर-थपेड़ ))
न मौत की वो ज़ालिम-पावन अंतिम रस्मे
न श्मशान-कब्रगाह पर हुज़ूम के मंझर ,चश्में
न रोने का, न सांत्वना का मौका
समाजी दस्तूर
न वो अपनो का विलाप न रोना-धोना अक्रूर ।
न नवमी , न ग्यारमी न उठामणा
न बारमे की धूप
न वो सामाजिक लेकिन अवैधानिक सुप
यानी अजायज खुजली में खाज मृत्यु भोज
सामाजिक कुरीति कहे या बहाना भूले गम-शोक
ना कही फातेहा न मज़ारों पे सोयम की धूप
ये कोरोना का संक्रमणकालीन संकट क्रूर खूब
ना अर्थी न जनाज़े न राम नाम सत्य का आलाप
पहले औपचारिक श्मशान तक अब वाकई प्रलाप
अब राम नाम आत्मिक पुकार सत्य बस सत्य
तब नहाने के बाद घर आते ही तब होता था खत्म
न अंतिम दर्शन न अपनो को पावन मुखाग्नि का क्रूर सुख
कब्र में खाक डाल जमीदोंज की
रस्म या इलाही मुख
सब कुछ बदल गया देखते ही देखते
कोरोना काल बन गया देखते ही देखते
जिंदगी छोटी थी भोतिक सुखों के मानिंद
कोरोना क्या छाया बड़ी हो गयी सब सुखों से इतर
विज्ञान उन्नत भौतिकताये उन्नत लेकिन विवश
राजा हो या रंक बस विवश विवश नहीं कलश
सामाजिक-धर्मनिरपेक्ष कोरोना लाएगा असल धर्मयुग
हो गए हैं हम अनैतिक बता रहा कलयुग
बात खत्म करू राहत फतेहअली की नज्म से
की तेरी आँखों का दरिया का उतरना भी जरूरी था
मोहब्बत भी ज़ुरूरी थी बिछड़ना भी ज़ुरूरी था
यानी ये महामारी शुद्ध करदे ह्रदय सब विश्वजन
ओर न्याय करे सभी से बन सच्चे मन , जन
*NK सेवक “सनातन”