~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

” कविता के बदलते मायने “

” कविता के बदलते भटकते मायने”

कविता थी कभी महत्ती देविक
अब नही हो गयी महज़ ऐहिक
आज के घोर व्यावसाईक दौर में
अह वो कलेवर वो कविता खोया ठौर में

इस बाजारू अघौर विकट दौर में
दर्शक वर्ग भी ठेठ बाजारू हो गया
जहाँ कविता का नही कोई वास्ता
कवि-दर्शक समाज को क्या हो गया

प्रबुद्ध दर्शक वर्ग क्यों लिए जाता आस्था
जब की वहा बस पाखंडो का रास्ता
आज इक अलग दर्शक वर्ग का छत्ता बसता
हो छिन्न भिन्न और हो जेसे दानवी दस्ता

मौका या के इंतज़ार छिछोरापन छाया अय्यार
शील -अश्लील ,जोड़-तोड़ घिनोना व्यापार
हंसाने का नही कोई सयाना हथियार
उससे उसका न कोई हाल न सरोकार
उसे तो हंसना है लांघे कवि कोई भी आकार
चाहे हो रीती निति में कितने ही अनाचार विकार

कविता में डूबना ,तेरना सुनना कोई नही चाहता
क्यों की भोतिक युग में उसे सब अपने आप है मिला
वही भागमभाग , तनाव , उठापठक न चेनो आराम
बेचारा आदमी बेचेन , जो हंसी ख़ुशी भूल गया
सो ढूंढता तब वो, कुछ भी हलका, हलके क्षण झिलमिला

कवि जो भी कहे ओछा पोछा वाहो में लेता है
हँसी कहां क्षणिक कहकहो में झूमता खोता है
क्यों ? क्योकि इसके बाद फिर झमेलो में खोना है
जमाने में हो कितनी खुशिया जीवन फिर इक रोना है

जमाने की इसी तर्ज पर आयोजक भी उतारू
तब वो आयोजक भी व्यावसाइक बाजारू
कवि भी समझदार दिखे सिर्फ उसे कलदार
तब वो बिन कविता के होता बडा असरदार

वो जोहरी अपने फनं का, जानता नही हैं पारखी
क्यों दिखावे इत्र जब हैं यहाँ सब नारकी अपारखी
कविता करे तो समझ से दूर ऊपर से जाती है
इसलिए वो इधर उधर की उधारी पिरोता है
और जोड़ तोड़ में ओन्धि अकविता परोसता है
और मोटा लिफाफा फोहरी लोकप्रियता का पैमाना
भ्रमित कुंठित की कवि हु कोसता छलक घूमता है

आज का कवि मन से खूब रोता बिलखता है
लेकिन वो, जिनका ये पेशा नही ,मानवी नशा है
लेकिन अकवि जो चिरोरी मन्नतों अवसरों से
हाँ बन पडा कवि ,चल पड़ा उसका धंधा है
वेध अवेध गल-अनर्गल जेसे भी आये बस पैसा आये
बस रहता उनका नशा फंडा है

आज दादू रेदास कबीर रसखान मीरा रो रही
तुलसी कालिदास सूरदास कुपित मर्यादा कोस रही
मैथिली नीरज प्रदीप सुभद्रा महा देवी की रोली
वो पंथ निराला हरिओध प्रसाद की बोली
अह मानवता पुकारती आहे भरति है
कविता कही भटक गयी ए “सनातन”
हे काव्यान्गना माँ शारदे कहा तेरा वैभव वो पुरातन ।
*nk सेवक “सनातन”

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