कुछ उछलती मौजो की बयार
मेरे मन मे खयाल अब कोई आता नही
मेरे मन को कोई समा भाता नहीं
ख़िज़ाँ से जाने प्यार क्यों है
अफसाना कोई लुभाता नही
जो भाया कभी
उससे महफ़िल मिली
बसंत भी महका
सावन भी झूमा
मगर सब वक्त के सायें
अब चमन फिर बहके मकरंद चाहता नहीं ।
nk सेवक “सनातन”