” कृष्ण पक्ष में ये कृत्रिम उजालो की रात”
दीवाली यानी भारत का सबसे महत्वपूर्ण सबसे बड़ा और इंतजार किया जाने वाला त्यौहार।
व्यापारिक दृष्टि से ये बाज़ारो में बूम या उछाल लाता है और हिंदी पंचांग अनुसार शुभम काल जिसमे धन तेरस पर स्वर्णाभूषण ओर अन्य प्रकार के साधन ओर वस्तुएं खरीदने की परंपरा जिसमें विश्वास और उमंग का ज्वार होता है और एक पवित्र धारा मन को स्फुरित करती है और इसके पीछे धार्मिक भावना मन को उद्देलित ओर आवेशित करती है और चंहु ओर एक दैविक भावना का संचरण होता है। देश के प्रधान सेवक ने अपने शासन काल मे स्वच्छ भारत अभियान को हवा दी और इसके अंतर्गत इसे गति और दिशा मिली है, ओर लोगो ओर स्थानिय सरकारों में जागरूकता ओर जिम्मेदारी बढ़ी है।स्वच्छता जीवन की अपरिहार्य आवश्यकता है। कोई भी मनुष्य ऐसा नही जो स्वच्छता से किनारा करे। लेकिन हां ये विचारधारा सिर्फ अपने ही घरों में काम करती है और सार्वजनिक स्थानों पर हम अपनी सच्ची नागरिकता का निर्वाह नहीँ करते। स्वच्छता का तात्पर्य सार्वजनिक स्थानों पर अपनी जिम्मेदारियों को निभाना ओर दिखाना। हमारे देश के रेलवे ओर बस स्टेशनों पर हम अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करें। और औषधालयों , स्कूलों,दफ्तरों,पार्को या बाग बगीचों ओर नदी-झीलों ओर तालाबों को स्वच्छ रखे। हम अपने देश की सड़कों को साफ-स्वच्छ रखे । इस कड़ी में सरकार भी हर आधे किलोमीटर में कूड़ा पात्र रखे और वो भी अच्छी तकनीकी वाले जो ऑटोमैटिक खुले ओर पूर्ण बन्द हो ताकि गंदगी न हो। आज निकायों ने जहाँ -जहाँ कचरापात्र रखे हैं वहाँ से निकलना भी दूभर होता है इसमें हम नागरिक ओर कर्मचारी अपनी भूमिका ठीक से नहीँ निभाते। इस प्रकार दीपावली पर्व का सफाई अभियान से गहरा नाता है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में वर्षभर का अटाला या अजरूरतमन्द ओर टूटी फूटी वस्तुओं का निस्तारण किया जाता है और घरों में साफ-सफाई और लिपाई-पुताई की जाती है और मकानों ओर परिसरों को सजाया जाता है। सार्वजनिक स्थानों को स्थानीय सरकारे सजाती -निखरती हैं यानी कुल मिलाकर चारो तरफ समा ऐसा बांधा जाता है कि खुशी सिर चढ़के झलकती है बोलती है ।
दीपावली का जहां पौराणिक महत्त्व है उसके साथ वैज्ञानिक भी की बरसात के मौसम में वातावरण में फैले किट-पतंगे जीवाणु-विषाणु दीपों की रोशनी में खुद ब खुद जल मर जाते हैं और पटाखों के शोर ओर धुवें से मच्छर-मख्खियां मर जाती हैं और इस तरह वातावरण में शुद्धता छा जाती है। दिपावली में रूपचौदस धनतेरस ओर दीपावली फिर खेकड़ा या नव वर्ष शक संवत का शुभारंभ इस तरह शुभदिनों की शृंखला मन मे उमंग घोल देती है और विशेष धार्मिक-सामाजिक आयोजन का विशेष आयोजन। लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्त्व ओर व्यापारियों के लिए नवबहि की शुरूआत ।
घरों में शानदार स्वादिष्ट व्यंजनों ओर नव वस्त्र धारण ओर विभिन्न प्रकार के पटाखे का प्रदर्शन , इस प्रकार मनोरंजन का चरम,खुशियों के खुमार,मुदित मनो की बहार ओर चारो तरफ घर हो या की बाजार या सार्वजनिक जगह सब रंग बिरंगी रोशनी से लकदक-जगमग।
इस तरह दीपावली भगवान श्री राम जो हिन्दओं के आराध्य हैं और भगवान विष्णु के अवतार जो एक महामानव रूप में राजा दशरथ के वहा माता कोसल्या के गर्भ से पैदा होते हैं और समाज को आइना दिखाने ओर समाज में नैतिक आदर्श स्थापित करने के लिये मर्यादित जीवन जीते हैं और अपरिमित शक्ति रखते हुवे मानवीय जीवन जीते हैं। वह रावण को मारने विभीषण, वानरों-भालुओ ओर पक्षियों का सहारा लेते हैं। जब लक्ष्मण मूर्छा हो जाते हैं तो जड़ी-बूटी का सहारा लेते हैं। राम अहिरावण द्वारा अपहृत होने पर हनुमान जी का सहारा लेते हैं। जीवन मे उनके महा व्यक्तित्व पर कुछ दाग जरूर हैं वो दाग ये जताते हैं कि सांसारिक जीवन मे बेदाग रहना कितना मुश्किल है। आप जिस परिप्रेक्ष्य में किसी प्रकुति का आंकलन करते हैं जनता और समाज उसे अपने दृष्टिकोण में ले सही-गलत ठहराती है। चाहे आप अपनी जगह सही हैं लेकिन जनता-जनार्दन इसे अपने तराजू में तोलती है अतः भगवान श्री राम पर जो आक्षेप हैं कि उन्होंने बाली को छुपकर तीर मारा क्योकि उन्हें ब्रह्मा जी के वरदान का पालन करना था यानी विडंबना की दोनो तरफ धर्म लेकिन दूसरे पक्ष में बाली अधर्मी था जो अपने भाई को समझने को तैयार नही था सो उसे मारना धर्म का पालन था। सीता जी को त्यागना वो भी एक धोबी के उलाहने पर वो ये दर्शाता है कि राजतंत्र ओर लोकतंत्र में एक साधारण व्यक्ति की बात भी शासन ओर शासक के लिए मायने रखती है। श्री राम ने सिर्फ एक बार अपना आपा खोया जब समुद्र को कई बार विनती की वह शांत नही हो रहा था तब श्री राम ने धनुष से तीर निकाल लिया लेकिन तभी समुद्र देवता अवतरित हुवे ओर राम से क्षमा मांगी और शांत हुआ और वानर सेना ने सेतु बनाना प्रारंभ किया। भगवान राम चौदह वर्ष के बनवास के बाद रावण को स्वर्ग पहुचां कर अनुज लक्षमण लो महापंडित रावण से महाज्ञान का पाठ पढ़ा विभीषण को राज्यारोहण कर अपनी राजधानी अपने वतन सीता मैया के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या लौटते हैं इस खुशी में अयोध्या वासियो का उल्लास आसमान पर होता है और सारा प्रदेश सजाया जाता है ओर तेल के दीपक जला रोशनि की जाती है। तेल इसलिए कि वो सहज उपलब्ध हो जाता है ओर हर कोई वहन कर सकता है। बस ये परम्परा सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्थायी रूप से आकार ले अनवरत जारी है। गांवों में मिट्टी के बने “मेरिये”बनाये जाते हैं जिसे लेकर गांव के बच्चे रात को घर -घर मोहल्ले घूमते हैं जिसमे लोग बड़े प्रेम और उत्साह से तेल डालते हैं ताकि मेरिया ज्यादा देर तक जले साथ ही उसमे पैसे भी डालते हैं जिससे बच्चे चॉकलेट वगेरह खा सके। बच्चे घूमते हुवे एक विशेष वाक्य बोलते हैं-आल दीवाली काल दीवाली पमने दाडे मेरियू अर्थात आज दिवाली कल दिवाली ओर पदसो ये मेर मेरयु यानी खुश। ये बागड़ उदयपुर क्षेत्र के ग्राम्य क्षेत्र में होता है और खेकडे के दिन एक दूसरे से मिलने का दौर -जमाल सा कह कर।दीपावली देश के बाज़ारो में तेजी ला देता है साथ ही लोगो के व्यवहार और स्वभाव में खुशी और उल्लास से लबालब कर देता है और उस जोश और ऊर्जा से पूरा साल फिर पुरि श्रद्धा ओर बिश्वास के साथ बीतता है। लोग आपस मे खुशियों को बधाइयों का आदान-प्रदान कर बाँटते हैं और खुशियां बाँटते ही चोगोनी जाती हैं और प्रेम -स्नेह का ग्राफ बढ़ जाता है।
दिवाली के उजले पक्ष से इतर एक दूभर-दुखद पक्ष भी है वो ये की इस त्यौहार पर लाखों रुपियो का धुँवा निकल जाता है यानी वातावरण दूषित वही धन का ह्रास ओर फिर छोटी-मोटी दुर्घटनायें जिसमे जुआ शराबनोशी पटाखों से चोटिल होना और कही छोटी-मोटी आगजनी। इस पर परम्परायें ज्यादा महत्ती औऱ खुशियां की पर्यावरण। फिर यू देखे तो परम्परायें गौण होकर समाप्त हो जाएगी लेकिन वक्त के सायें समाज बदले हैं परम्परायें भी। क्योकि परंपराएं जान से जीवन से बढ़ कर नही। परंपराएं हमी बनाते हैं और हम ही तोड़ते हैं। जान है तो जहांन है अतः सही है कि हमने परम्पराए बदलना स्वीकार किया। अभी हमने दुर्गा मूर्ति विसर्जन को प्रतीकात्मक स्वीकारा गणेश मूर्ति विसर्जन भी। ठीक उसी प्रकार इस्लाम के बंदों ने ताजियों को ठंडे करने का रिवाज प्रतीकात्मक रूप से अपनाया। दीवाली की 12 दिनों की छुट्टियां विशेष खुशी देती हैं लेकिन नोकरी-पेशा लोगो को। विद्यार्थी पढाई से थोड़ी राहत ले शून्य जॉन में जीवन का आनंद लेते हैं।
इक अंतिम बात की दीवाली किसकी ? सिर्फ धनी ओर मद्यम ओर उच्च वर्ग लोगो की ही होती है इस कड़ी में वो छोटा तबका जो गरीब है विपन्न है जिसे दो वक्त की रोटी नही मिलती नए वस्त्रो की बात तो दूर तन ढकने के लिए वस्त्र नही साबुन के पैसे नही ओर जिनके सर पर छत नही और उनके लिए त्यौहार कोई उल्लास का सबब नही ये त्योहार उन्हें दुःख देते हैं और वो वर्ग उन्हें निराश करता है इस विषय मे हमे सोचना चाहिए को ये वर्ग भी दिवाली मना सके । इस प्रकरण में समाज सेवी संस्थाएं ,धनी कॉरपोरेट वर्ग और देश की सरकार संज्ञान ले और इक विशेष बजट के तहत उन्हें भी इस खुशी में समान रूप से न सही आंशिक रूप से शामिल कर मानवीय भावनाओं को तृप्त कर एक सामाजिक समता का प्रकाश फैलाये।तभी दीपावली का ये महापर्व मानना सार्थक होगा।
इस कड़ी में एक मेरा शेर —
*की खुद के उजाले थोड़े कम कर ले ;
गर तेरे थोड़े से उजाले बांटने से ,
घर उसका रोशन होता है !!
* नरेश कुमार सेवक “सनातन”
उदेपुर( राजस्थान)
घोषणा
मै शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ की ये लेख मेरा अपना है और अप्रकाशित है।
7742537602