~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

चंद्र कलाएं अब पूर्णमासी ही पूर्णमासी कृष्णपक्ष अब रहा ही नहीं

चंद्र कलाएं अब पूर्णमासी ही पूर्णमासी कृष्णपक्ष अब रहा ही नहीं

★ अब वेतन पूर्णिमा के चाँद से अमावस नहीं होता !★

उनकी सेलेरी बेतहाशा बढ़ रही है यू ज्यूँ सुरसा के मुँह की तरह
ऊपर वार-तीज-त्यौहार बोनस का अतिरिक्त उपहार विरल
उन बेचारों का क्या बोनस की बात तो दूर कुछ नही तरल
मजदूरी भी तय शुदा मानक पर नसीब नही होती यू सरल

ओर माह में 15 दिन तो बेगार- बेरोजगार रहना पड़ता है
अब वो महान प्रेमचंद जी की कालजयी उक्ति सार्थक नहीं ठहरती जान पड़ता है
की तनख्वाह तन को खा जाती है
या के उपमा उन चन्द्र कलाओं कि की वेतन शुक्ल पक्ष के चाँद की तरह है
जो घटते – घटते एक रोज मावस अमावस में बदल जाता है !
*nk सेवक ”सनातन”