चंद्र कलाएं अब पूर्णमासी ही पूर्णमासी कृष्णपक्ष अब रहा ही नहीं !

चंद्र कलाएं अब पूर्णमासी ही पूर्णमासी कृष्णपक्ष अब रहा ही नहीं !

★ अब वेतन पूर्णिमा के चाँद से अमावस नहीं होता !★
उनकी सेलेरी बेतहाशा बढ़ रही है यू ज्यूँ सुरसा के मुँह की तरह
ऊपर वार-तीज-त्यौहार बोनस का अतिरिक्त उपहार विरल
उन बेचारों का क्या बोनस की बात तो दूर कुछ नही तरल
मजदूरी भी तय शुदा मानक पर नसीब नही होती यू सरल
ओर माह में 15 दिन तो बेगार- बेरोजगार रहना पड़ता है
अब वो महान प्रेमचंद जी की कालजयी उक्ति सार्थक नहीं ठहरती जान पड़ता है
की तनख्वाह तन को खा जाती है
या के उपमा उन चन्द्र कलाओं कि की वेतन शुक्ल पक्ष के चाँद की तरह है
जो घटते – घटते एक रोज मावस अमावस में बदल जाता है !
*nk सेवक ”सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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