जाने क्यू ….!!
जिंदगी एक तुला या कहो तराजू सी
एक पल इधर एक पल उधर उलझी-सुलझी सी
समीकरण यू बदलते हैं
कभी a कोष्ठक से बाहर कभी अंदर
जिंदगी भी B सी
यदि कुदरत महरबान
तो A स्क्वायर तो कभी क्यूब तो कभी पावर 4
वाह ओर आह
आह ओर वाह
लेकिन सत्य यही
कितने ही ऐश हो
आराम धन संपत्ति
जिन्दी आहे देकर
ही खत्म होती है
जिसे आदमी यू ही भूलता है
असल मे कभी भूलता नही
सिर्फ एक मौत की डगर ही अंतिम
इसका इस जहां में कोई तोड़ नहीं
अवतार, मसीहा, पैगम्बर
बड़े-बड़े तपस्वी ,मनीषी
यहां आए लेकिन
जाना ही रहा सबकी नियति
नश्वर जहां का बस यही सत्य
मौत ही उजाला है
मोक्ष ही परमधाम बेशकीमती !!
*nk सनातन