टेलिसिनेमा में देवी-देवताओं के अंतरंग दृश्य ओर भारतीय द्वंदात्मक सोच !

टेलिसिनेमा में देवी-देवताओं के अंतरंग दृश्य ओर भारतीय द्वंदात्मक सोच !

● सीरियल ॐ नमः शिवाय में इन्द्रिय दृश्य पर आस्था का रोष ●
हिन्दू धर्म मे फतवा का कोई निय म नहीं है , न ही ईश निंदा यानी ब्लासफेमी हिन्दू धर्म मे कोई अपराध या जुर्म, क्योकि ये एक महाधर्म है और समस्त धर्मो की जड़ या जननी है और उदारता ,मुक्त हस्तता, विरल चरित्र, वृहद सोच इसके जेवर हैं ओर मनुष्य का प्राकुतिक अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आदियुग से ही स्वीकृति दे बलवती बनाया गया है तभी सनातन संस्कृति में महान ग्रंथ लिखे मिले हैं और इस कड़ी में वात्स्यायन का कामशास्त्र ओर अन्य विद्वान द्वारा मदन ओर अनिरुद्ध ओर भगवान शिव,कृष्ण,इंद्र, नारद के इन्द्रिय मनोरथ ओर कृत्य पर मनीषियों ने बहुत कुछ स्वतंत्रतापूर्वक लिखा है ये उस काल के महान समाज की वृहद सोच का परिचायक है ।
भारतीय हिन्दू ग्रंथो में शिव , इंद्र, विश्वामित्र ,परासर का इन्द्रिय चरित्र पर , वेदव्यास का नियोग गमन पर, वात्स्यायन का योन गमन और शिक्षा पर कामशास्त्र या कोकशास्त्र जो दो विपरीत लिंगो का यौनाचार या प्रेमालिंगन वैधानिक ठहरता है और असहमति में बलात को अनाचार ठहराता है । ओर बहुत कुछ उद्धत है जैसे शिव का मोहिनी प्रेमालाप, मेनका से देवऋषि विश्वामित्र का प्रेम मिलन, इंद्र का बलात ऋषि भार्याओ से,परासर का योन मिलन मत्स्यगंधा से, वेदव्यास का नियोग अम्बा,अम्बिका से ओर सारे वृतांत चूंकि संस्कृत यानी देव वाणी में उद्दत सो किसी विद्वान या ब्राह्मण ने इसे आम नही किया ओर लिखा विद्वानों और कुलीनों ने ही था चाहे अन्योक्ति ,अतिश्योक्ति,
चाहे काल्पनिक लेकिन आम जनता तक नही पहुँचा क्योकि केवल ब्राह्मण वर्ग ही शिक्षित था ओर अन्य वर्ग कामकाजी था। ओर देववाणी संस्कृति सिवाय ब्राह्मण वर्ग के कोई नही जानता था तो कई उकेरित तथ्य ग्रंथो में ही रहे और जैसा ब्राह्मणों ने व्याख्या कर समझाया ,बताया समाज ने यही जाना और उस जान में ईश्वर के प्रति भय और ब्राह्मणों के प्रति भी भय और श्रद्धा का भाव व्याप्त किया यानी ब्रह्म वाक्य परम या एकमेव ईश्वरीय सत्य जिसमे शाप सबसे भयानक हथितार रहा! कर्मकांड बढ़ गए जिसमे ब्राह्मण की आय भी बढ़ गयी जो वाकई शास्त्रीय ज्ञान रखते थे उनकी। लेकिन
आधुनिक युग में छापाखाना, संचार तंत्र की वजह से ये तथ्य आम हुवे ओर किसी हिन्दू ने इस पर इशारा या आक्षेप नहीं किया क्योकि लिखने वाला सामने नही था और फिर प्रकांड विद्वान और हिन्दू अतः शिकायत करे तो किससे! वात्स्यायन को भी समाज ने मान्यता दी, पूजा क्योकि यौनाचार या देह मिलन,संसर्ग ही जीवन उत्तपत्ति का मूल व्यवहार अतः सोच वृहद थी और ईश्वरीय प्राणी उत्तपत्ति सिद्धांत पर आरोहित अतः स्वीकार्य रहा और सुना जाता है कि उस ग्रंथ से पश्चिम ने काफी कुछ व्यावसायिक रूप से भुनाया। भारत वर्ष में काम को धार्मिक और सामाजिक मर्यादा में बांधा गया है या पाबद्ध किया है अतः सर्वसम्मति से जिसे समाज आनचार ओर अवैधानिक मानता था को वैधानिक बनाया गया और सभ्यता के नाम पर यह अनुशाषित होकर मर्यादित अनवरत चल रहा है क्योकि इस व्यवहार के बिना जीवन संभव ही नही है! और ये शालीनता मानव को जानवरों से अलग रख रहा है ओर कह सकते हैं कि मानव समाज ने आदि ओर आदिन युग को कॉफ़ी पीछे छोड़ दिया है!
अब बात उन अंतरतम दैहिक ओर प्रेमिल दृश्यों की जो “ॐ नमः शिवाय” धारावाहिक में फिल्माए गए और प्रसारित हुवे जिस पर कुछ भक्तों ने आपत्ति जताई ! तो
सिनेमा और सिरियल्स में शिव महिमा को दिखाया जाना कहां तक उचित है जिसमें मूल विषय,किवदंतियों के इतर काल्पनिक तथ्य भी पिरोए गए,गूंथे गए हैं और कुछ अंतरतम ओर दैहिक अंतरंग दृश्य परोसे गए हैं जिस पर विवाद और आक्षेप मढ़े जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि सेंसरबोर्ड ने ध्यान नही रखा और ये धार्मिक भावना पर कुठाराघात है ! ओर ये बर्दाश्त इसलिए नहीं कि दूसरे धर्मों के संबंध में सिनेमा, सीरियल तो क्या पत्र -पत्रिकाओं में भी कोई भी प्रदर्शित करने की हिम्मत नही करता क्योकि ईश निंदा वहां सीधा अपराध है। लेकिन सनातन वैदिक धर्म इतना छद्म,लघु या संकीर्ण नही हैं वो पूरा अनंत ब्रमांड को समाये हुवे है और उसका परम शब्द ॐ अपने आप मे पूरे ब्रमांड को समेटता है । इस संबंध में मेरे एक मित्र ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की ओर टिप्पणी में यही दर्द जताया कि सिनेमा समाज का आईना होता है इसलिए ऐसे दृश्य गलत संदेश दे नव ओर वर्तमान पीढ़ी को भ्रमित करते हुवे गलत मानसिकता में झकड़ते हैं! मैंने उनकी प्रतिक्रिया में प्रतिक्रिया देते हुवे कहा कि आपकी टिप्पणी अपनी मानसिकता ओर कट्टरवादी सोच के व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हुवे सटीक है लेकिन उचित नही कही जा सकती …!
परितवर्तन संसार का नियम है और आदिकाल से आज तक बहुत कुछ बदला है…ओर स्वीकार्यता -अस्वीकार्यता व्यक्ति ,समाज की मानसिकता पर निर्भर है । हमने बहुमत के सिद्धांत पर सामाजिक,आर्थिक ,
धार्मिक,नैतिक नियम बनाये हैं जाहिर है बहुमत में सिर्फ एक मत से वह
प्रस्ताव पास हो कर प्रभाव में आ जाता है ! यानी 50-49 अनुपात यानी 49 व्यक्ति असहमत हैं लेकिन उस नियम को मानने को प्राबद्ध हैं क्योकि आपने उस प्रजातांत्रिक बहुलवादी धारा , सत्ता को स्वीकारा है! ये प्रजातांत्रिक व्यवस्था का धुंधला लेकिन कहने को श्रेष्ठ विचार एवम शासन ……!राजतंत्र, कुलीन तंत्र,भीड़तंत्र , तानाशाही शक्तितन्त्र में नियम-कायदे एकमेव सिद्धान्त पर थोपे जाते हैं और सिर्फ हथियार तंत्र सारी व्यवस्था को संभालता है ! और व्यक्ति उस निर्मम व्यवस्था में दुबक-सहम सहता है ओर विरोध में जो सर उठाता है कुचल दिया जाता है । यानी जहाँ जनता बहुमत में खड़ी हो जाय तो क्रॉमवेल के नेतृत्व में इंग्लैंड की क्रांति का सूत्रपात हो पोपतंत्र, राजतंत्र को उखाड़ फेक दिया जाता है….
यानी परिवर्तन संसार का वांछित नियम है और आप देखे की पाश्चात्य धार्मिक साहित्यिक मान्यता में धरती को किसी हर्क्युलिस ने उठा रखा था आज स्प्ष्ट है पृथ्वी गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त पर हवा में बिना किसी सहारे के टिकी है ठीक उसी प्रकार वैदिक धर्म ग्रंथानुसार पृथ्वी शेषनाग पर टिकी थी नही टिकी है और भूकंपो का कारण उसका फन न हिलाना बल्कि धरती में कच्ची परतों या प्लेट का खिसकना ओर आपसी घर्षण है!
अब बात सिनेमा की जिसे 1950 से पहले भवाई ओर पात्र द्वारा अभिनय भांड गिरी …नाचना गाना बजाना निम्नतर कृत्य की श्रेणी में थे और उच्च कुलीन लोग इस व्यवसाय में जाना हेय मानते थे…
लेकिन आधुनिक विज्ञान की इस परम देंन ने परिवर्तन की क्रांति ला दी! और इस परिवर्तन की आंधी ने सब कुछ मिटा इसे श्रेष्ठ तम व्यवसाय बना दिया और जिसमे चमक-दमक यानी ग्लेमर,प्रचुर धन, ईर्ष्या मय ख्याति ओर ऐशो-आराम का जीवन जहां राजनीति ओर उसके आंका भी झुकते है सलाम करते है ! आपको राज्यसभा सदस्य के मनोनयन से नवाजा जाता है.. सहज ही सांसद का टिकट मिलता है और आप हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे कद्दावर राज नेता जो PM बनने की होड़ में थे बच्चन साब एक बहुत बड़े अंतर से है पराजित कर उनका राजनीतिक जड़ अदना सा कर देते हैं …यानी सिनेमाई अभिनेता राजनेता से भी बड़े हो गए और राजनीति उनकी ख्याति को भुनाती है!
यानी परिवर्तन के चलन में ये कर्म उच्चतम एवम प्रतिष्ठित हो गया …! निसंदेह सिनेमा समाज, संस्कृति और देश का आईना रहा है और इस आईने में चलचित्र शैशव काल मे वही परोसा गया जो समाज मे आबद्ध था …अधिकांश धार्मिक ओर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की फिल्में बनी… लेकिन शने शने इसमें पश्चिमी संस्कृति, विचार,मानसिकता
की प्रविष्टि हुई जो चकाचौंध ओर वृहद सोच के तहत सब कुछ खुले यानी संकीर्णता से परे एक आजाद ओर मानवीय सोच जो लैंगिक समानता को तरजीह देती थी क्योकि पश्चिमी जगत में सर्वप्रथम स्वतंत्रता के लिए , उद्दोग के लिए , विकास के लिए,शिक्षा के लिए क्रांतियां हुई और ये बलवा रंग लाया और व्यक्ति व्यवस्था का गुलाम नही होकर स्व का स्वामी बना ओर् समान अवसरवाद अमल में आया ओर राजतंत्र समाप्त होकर देश गुलामी की जंजीरे तोड़ लोकतांत्रिक हो गए ! और यही दर्पण भारत मे आया क्योकि 250 वर्ष फिरंगियों ने शासन किया और गुलामी ही सही ओर खुद जी सुविधा के लिए ही सही के लेकिन भारत को आधुनिकी दी , शिक्षा को मुक्त बना आम बनाया ,सार्वजनिक बनाया, जाति वाद, ढकोसला वाद, अंधविश्वास कुरीतियों के पर कटे..
ओर सिनेमा के द्वारा ये सब बड़ी सक्षमता से पिरोया गया। हमने देखा महान प्रेमचन्द उर्फ धनपतराय ने सर्वप्रथम विधवा विवाह किया और हिम्मत दर्शाई ओर धीरे- धीरे ये प्रथा समाज मे स्वीकृति पा गई..तलाक प्रथा भी जिसमे एक स्त्री- पुरूष जीवन भर सिर्फ 7 फेरो से बंधे रहने को विवश थे आज सहज तलाक हो रहे हैं यदि दोनों आपस मे असंतुलित हैं.. ! दिवराला कुख्यात या प्रख्यात सती कांड राजस्थान में हुवा फिल्मों के जरिये इसकी भत्सर्ना हुई हालांकि राजा राम मोहन जी के ज्वलन्त प्रयासों से अंग्रेजो ने इसे कानून बना नेस्तनाबूद कर दिया था ..गाँधीजी के द्वारा अपश्यता ,छुआछूत अपराध हो
जातिप्रथा पाटने का ज्वलन्त प्रयास जो समय के साथ न्यून हो रहा है…ओर भारत के लिए ये शुभ संकेत है!
अब समय धारावाहिक ओर वेब सीरीज का तो राइट टू एक्सप्रेशन के तहत ये जायज है ! कल्पना पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए…यदि रोक होगी तो नए विचार ( नकारात्मक -हकरात्मक ये व्यक्ति की सोच पर निर्भर ) कहाँ से ओर कैसे आएंगे और विकास कैसे होगा और वही दकियानूसी विचार समाज मे चलते रहेंगे…!
बात शिवजी-पार्वती जी के प्रेम दृश्य तो ये धार्मिक दर्शन में सबसे पूजनीय प्रेमी युगल ओर उनके देह मिलन के लिए विशेष प्रयोजन ही सही देवो ने स्वयं प्रार्थना की ओर शिव-रति मिलन यानी शिवरात्रि को दोनो का विवाह संपन्न हुवा … ओर जहां तक कामशास्त्र तो अजंता-एलोरा ,खजुराहो में जो ऐतिहासिक छवियां उत्कीर्ण हैं, ओर कई मंदिरों में भी जो इरोटिक प्रकति की छवियां है तो इसमे हम प्रेम देखे, वासना ये आपकी मानसिकता पर निर्भय …*वैसे सेलिबेसि या ब्रह्मचर्य कि थोपी गयी सोच से अधिकांश लोग ब्रह्मचारी बनने लग गए जो विचार गलत ढंग से आरोहित थे …ओर उस भ्रामक सोच को दूर करने देवालयों में कामक्रीड़ा की कामात्मक मूर्तियां उकेरी गई! वैसे हमने शादी बंधन सिद्धान्त में दो विपरीत लिंग के युगल के शारिरिक मिलन को जायज बनाया है !
कृष्ण को प्रेम का पर्याय ओर चोरी ,रास लीला गोपियों संग छेड़छाड़ ये सब बरसाना ब्रिज,बिहार की होली ओर् त्योहार मे साधारण बात और वो कृष्ण की अठखेलियाँ ओर लड़कपन की क्रीड़ाये -लीलाएं हैं और एक विशेष प्रयोजन स्वरूप थी यू कहे कि मोह की माया थी..!
उदारता ओर सहज सोच हिन्दू सनातन सोच की सबसे बड़ी पूंजी रही है और देखे की सिर्फ एक ही देश है दुनिया का जिसमे कुल वैश्विक आबादी 6 अरब में 125 करोड़ हिन्दू है और ओर पश्चिमी सोच और मेडीकल साइंस की बड़ी उपलब्धि परिवार नियोजन जिससे संख्या कम हुई ,सीमित हुई है और वैसे बौद्ध भी हिन्दू धर्म की शाखा ओर आधा चीन बौद्ध तो कुल 6 अरब में 2 अरब से ज्यादा हिन्दू सिर्फ दो देश मे …ओर जातिवाद का विष हिन्दू धर्म मे न होता तो शर्तिया पूरा विश्व आज हिन्दू होता…
अतः नीचौड़ मेरे मन्तव्य का की हम ओरो की तरह कट्टर नही हो सकते न ही होना चाहिए और धार्मिक पुस्तकों में पूजा में ये आह्वान है रुद्र पुराण में कि हे ईश्वर मुझे वीर्यवान बनाना पुत्र वान (हालांकि ये लैंगिक भेद ओर महत्ता के विरुद्ध है गणपति की आरती में बाँझन को पुत्र देत भई पुत्र क्यो पुत्री क्यो नहीं ये पुरूष प्रधानता क्यो पर सवाल हो सकते हैं ?
हमने वात्स्यायन दिया है, पतञ्जलि दिया है ओर ये संकीर्णताओं से परे संपत्ति है। आज उदारता के कारण इतनी चीजे नेट, वेब, टीवी स्क्रीन- पर्दे पर देखने मिलती है क्योकि इसका विरोध नही होता….ईश्वर का दूध द्वारा अभिषेक या नहलाना ठीक है ये एक धार्मिक प्रथा है कृष्ण को 56 भोग, महावीर स्वामी को महावीरजी में सोने से लदना, मढ़ना आज के परिपेक्ष्य में सवालों के घेरे में है . क्योजी लाखो बच्चे दूध से वंचित …ये धार्मिक ट्रस्ट उन बच्चों को दूध पिलाये ओर पुण्य कमाए! शिव जो अघोरी जिन्हें नहाने की जरूरत ही नही जो समस्त मानवीय प्रकुति से ऊपर जो ईश्वर है… 56 भोग जो कृष्ण खाते ही नही पंडे- पंडित ही मझे लेते हैं, गरीबो में अपक्ष रोज बांटने चाहिए…!
इस्लाम और ईसाइयत पर मैं कुछ नही कहूंगा क्योकि ये महान काम महान कबीर बड़ी बेबाकी से कर गए हैं और उन जैसी सटीक आलोचक आज तक नही हुई (हालांकि कबीर ने ईसाइयत के बारे में नही लिखा उन्होंने हिन्दू ओर् इस्लाम के अंधविश्वास को इंगित कर कोसा है) जिसने न हिन्दू न इस्लाम को बख्शा…!
हा इस्लाम का बंदा या अनुयायी इसकी आलोचना करे तो जायज है,अच्छा है, हम करेंगे तो सौहार्द्र ओर जातिगत मुद्दा बनेगा..
दिवंगत अभिनेता इरफान खान ने बक़रीद पर बकरे की कुर्बानी पर तंज या टिप्पणी करने का साहस किया उन पर फतवा ऐलान हुवा ओर बुरा भला कहा …वाजिब था लेकिन उनकी असामयिक मौत पर इन कट्टरपंथीयो को मौका मिला कि अल्लाताला ने उसे बता दिया…साला बेमौत मरा केंसर से…!अभी कल- पड़सो शाहरुख ने भी गणेश विसर्जन पर टिप्पणी की ओर फोटोग्राफ सोशल मीडिया पर डाले जिसे कुछ हिंदुओ ने प्रशंसा की, कुछ ने भत्सर्ना की जबकि वो हर साल गणेश महाराज की स्थापना करते हैं चुकी उनकी पत्नी हिन्दू है और दोनो संस्कृति उनके घर- परिवार में समान है…!
अतः मित्र ईश्वर एक कल्पना है जो भयवश की गई और स्वार्थ वश सुख शांति के लिए आज तक कायम है और अनंत जल तक रहेगी…! आजतक उन्हें किसी ने नही देखा
बस आस्था है और मानव ने सिर्फ अपनी तरह कल्पना कर मायावी अवतार बना मनुष्य की तरह ही पेश किया है ! ईश्वर को पुत्र-पुत्री की कहा जरूरत, चूहे- मोर-गरुड़ की सवारी जो स्वयं सिर्फ इच्छा से सब कर सकते हैं, हथियारों की कहाँ जरूरत जो स्वयं माया ओर सर्वशक्तिमान हैं…..!
यानी हम सब कयास और भ्रम में जीते हैं
कुछ लोग नास्तिक हैं यानी उन्हें ईश्वर जैसी कोई शक्ति है तो है नही
मानते !
अब क्या सत्य है इसका कोई सत्य नही है!
बस आस्था ,विश्वास और अनुमान मे कल्पनातीत शक्ति को हम मानते आए हैं!
विज्ञान ने इसे नकारा है क्योकि तब था तो अब क्यो नहीं ?
है तो कोई पुख्ता प्रमाण क्यो नहीं ?
बात कामोउत्तेजक एवम अंतरंग आलिंगन बद्ध दृश्यों की तो
हां भगवान शिव और महाशक्ति पार्वती के प्रेममय आसक्त चित्रों की
सीरियल में सूट या फिल्माए दृश्यों की
जो कि गलत है उन धर्म और सामाजिक संस्कृति के ठेकेदारों की सोच में
ओर उन दृश्यों पर आपत्ति है !
ओर आपत्ति इसलिए है कि अन्य दो बड़े धर्म है
जिसमे ऐसी हिमाकत करने की किसी को भी इजाज़त नही है !
ओर ये कोमे इस प्रकार के कृत्य बर्दास्त नही करती
तो हमारे अर्थात हिन्दू धर्म मे ऐसा क्यो ओर क्यो ग्राहय /
लेकिन ये कृत्य किसी हिन्दू निर्माता-निर्देशक के द्वारा ही सूट किये गए हैं
ओर भारतीय संविधान और सेंसरबोर्ड द्वारा हरी झंडी द्वारा स्वीकृत हैं !
हाँ पद्मावती फ़िल्म बनी क्षत्रिय समाज ने विरोध किया तो कुछ बदल कर रिलीज हुई
गोलियों की रास लीला का नाम भी पहले धर्म से जुड़ा हुवा था नाम बदल कर रिलीज हुई
ओमायगोड़, पीके आदि रिलीज हुई जिसने तथ्यात्मक कुछ सटीक सवाल थे। तो किसका क्या नुकसान हुवा कुछ नही जो आस्तिक हैं डीग नही सकते चाहे कुछ भी दिखाओ !
ओर जो तर्क-वितर्क में गए !
उन्होंने ज्ञान लिया ओर पोंगा पंडितो।की जगह जरूरतमन्द को देना शुरू किया। भगवान शिव पर दूध चढ़ाने जो नालियों में बहता है तो जरूरतमंद बच्चों को पिलाना शुरू किया । भगवान को नहाने की जरूरत …अरे भाई वो भगवान हैं अपन की तरह साधारण मानव थोड़े हैं ! ओर भारत मे कई बच्चे कुपोषण का शिकार हैं तो दूध की जरूरत उन्हें हैं । शिव स्वयम भी यही चाहते होंगे। तो ऐसे रेडिक्लाईजेशन होता है यदि नहीं दिखाते तो अंधता चल ही रही है। पर्यावरण को लेकर मूर्ति विसर्जन, ताजिये ठंडे की प्रक्रिया ने बदलाव समय को देखते हुवे स्वीकारा ही है। कोरोना के कारण भी हमने कई सामाजिक,धार्मिक परम्परों की आहुति दे स्वीकार है । यानी कोई चीज,परम्परा जड़वत नही होनी चाहिए।और सोच दूरस्त हो तो सब ठीक है। मानव की उत्तपत्ति भी दो शरीर के मिलन से जिसे हेय ओर अधार्मिक माना है लेकिन विशेष विधान में ढालकर उसे वैधानिक -धार्मिक ओर मान्य बनाया है तो कुछ गलत नही है बस आप पवित्र दृष्टि से सब देखे, सब कुछ सही है! अंतरंगता प्राकुतिक है और ईश्वरीय देंन है तो फिर ये आप्राकृतिक कैसे । ये दानवीय कृत्य होता तो ईश्वर इसे अस्तित्त्व का अनिवार्यतः सिद्धान्त क्यो बनाता ? ठीक है इसे आपने अपने सिद्धान्त से मर्यादित , अनुशासित किया है और इस तरह आपने जानवरो से अलग किया है तो ये आपकी अपनी सभ्यतम, सामाजिक व्यवस्था है । हिन्दू धर्म मे मनुष्य ने ईश्वर को मानव अवतारी रूप में पेश किया है जिसमे संभोग से ही संतति संभव है लेकिन हां मंत्रोचार कर उन देव द्वारा उन देविस्त्री का समागम कर अर्जुन,कर्ण, दुर्योधन, युधिष्ठिर, भीम पैदा हुवे जबकि उन देवी स्त्रियों का सांसारिक साथी या पति कोई और था ! तो जब आपने ईश्वर को भी मानवीय रूप में घड़ा है तो ये दृश्य आम मानवीय हैं इसमे क्या आपत्ति क्या गलत ! हां मूल सनातन वैदिक संस्कृति और धर्म मे ईश्वर अलौकिक,अअवतारी,
निरंजन,निराकार, अजन्मा,सर्वशक्तिमान, सृष्टि निर्माता तो ऐसी तुच्छतम कल्पना की ईश्वर के हज़ार हाथ,गरुड़,मूषक सवारी,तलवार ,भाला चक्र हथियार केवल मानवीय कल्पना है ! यानी वह समस्त मानवीय प्रक्रियाओ, रूपो ,स्वभावो से ऊपर है!और हम जो भी देखते हैं मानते हैं पूजते हैं, भजते है प्रतीकात्मक है !
इस पूरी जिक्र ऐ वफ़ाई -बेवफाई में में सार यही रखूंगा की प्रेम प्रसंग पवित्रमं है और हर प्रेमी ओर वैवाहिक युगल इसे आत्मसात करता है भारत वर्ष में सरेआम नही करता हालांकि पाश्चात्य संस्कृति के पुरजोर असर से निजी जीवन मे भी अंतरंगता प्रदर्शन बढ़ा है यानी कि सार्वजनिक हुवा है और वेलेंटाइन डे अपने पैर भारत मे फैला रहा है हालांकि सरकार ,सरकारे, निजी ,धार्मिक और सामाजिक संगठन दो खेमो में बंटे हैं और बंटे हुवे लोग प्रेम प्रदर्शन को अपराध मान कर दंडित,लज्जित ओर प्रताड़ित करते हैं ये संवैधानिक रूप से गलत है सही है बहस का मुद्दा है । अमेरिका ,इंग्लैंड,रूस के राष्ट्र प्रमुख सरे आम अपनी प्रेमिका -पत्नी को चुम्बन देते हैं ,आलिंगन क्योकि उनकी संस्कृति में ये आम और ग्राहय है लेकिन भारत का राष्ट्र प्रमुख अपनी पत्नी का हाथ पकड़ने में भी संकोच करता है और प्रेम और प्रेमिका दूर की बात है ! योन मिलन ईश्वरीय देंन है और मानव ओर प्राणी-जीव उत्पत्ति का मूलाधार तो सोचने का विषय है कि ये इतना बुरा,अग्राह्य ओर अनैतिक होता तो ईश्वर ये प्रकुति धरती जगत पर रखते ही क्यो। व्यक्ति ने वस्त्र पहन रखे हैं लेकिन सब को पता है सबके गुप्त अंग कहा है और व्यक्ति जब आसक्त ओर वासनामयी होता है तो कल्पना करता है उत्तेजित होता है और बलात जैसे जघन्य अपराध होते हैं लेकिन हां आसक्ति दोनो विपरित लिंगो में सकारात्मक है तो विधान इसे जायज ठहरता है । ईश्वर का कोई स्वरूप नही है और ये संसार के प्रथम ग्रंथ ऋगवेद में ये तथ्य उद्धत है लेकिन ये निर्गुण धारा के बाद विद्वानों ने सगुण धारा यानी ईश्वरीय रूप की कल्पना मानवीय रूप में की ओर उनके चार हाथ,हज़ार हाथ,चार मुख,दस मुख ,अवतारवाद को आरोहित किया और तब से व्यक्ति दो धाराओं में बंट गया और सगुण में ईश्वर का रूप मानव जैसा ही तो है और उसे शक्ति परक दर्शाया है। आप देखे किसी बहुरूपिये को ओर फैंसी प्रतियोगिता में मनुध्य वस्त्रों और
मेकअप द्वारा हूँ बहु ईश्वर के अवतारों जैसा लगता है। अरुण गोविल के लुक,अभिनय ओर स्वांग ने लोगो को भ्रमित कर दिया की साक्षात श्रीराम का अवतार हैं रामानंद सागर साब के माइल स्टोन सीरियल रामायण में। तो मानव द्वारा ईश्वर के अवतारों द्वारा प्रेम प्रदर्शन अपराध नही ।ये प्रेम उनकी की देन-भेंट है तो इस पर कट्टरता का चोला पहना कर संकीर्णता दर्शा सामाजिक, धार्मिक, आस्तिक वातावरण असंतुलित करना उचित नही है। हम सब वास्तविकता से परिचित हैं और ऐसे मुद्दों को तूल देना अपने महान उदारवादी ओर वृहद धर्म को कमतर करना है !
*nk सेवक ”सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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