★ कबीर सी केवणि और डाबर घुट्टी सूं पिवणि★
■गीत वो जिसमे जज्बात हो ,बोलो की धनक और खनक हो
की तरन्नुम से गुजर गले से छू दिल मे उतर जाए
के तन-मन झूम जाए
साफ़ तौर पर यू कहे कि
धरती पर ही जन्नत सा सुहाना सफ़र हो
जाये ।
*NK सनातन
■ आदमी ओर औरत में फर्क को मैं यू बया करू
की आदमी एक आम पत्थर घर की चार दिवारी का ।
ओर औरत संगेमरमर क़ीमती जो गहना सजता मंदिर में पावन सा ।।
*nk सनातन
■चाहे कितनी ही बुरी कहो मुझे ;
मैं शराब मैखाने में सदियों से बदस्तूर जारी हूँ !
*nk सनातन
■दारू बंदी के बावजूद चाहे जितनी मैं मिलती हूँ मेरे शौकीनों को
ये क्या किसी जन्नती चमत्कार से कम बात है क्या !
*nk सनातन
■हर जश्न की मैं शान हूँ
कई गलोँ की मैं तड़प ओर तलब
लोग कहते हैं मुझे महबूबा
मैं टूटे-जुड़े दिलो का सरताज हूँ
लोग यू ही मुझे बदनाम किये हुवे हैं
मैं शराब दिल ऐ महफ़िल सुरूर खास हूँ !
*nk सनातन
■ कल की परवाह कर आज को मार कर जीते हैं कुछ लोग
सवाल ऐ ”सनातन” की कल तो कभी होता नही भला आज को क्यो मारते हैं वो लोग !
*nk सनातन
■ मरना तेरे हिस्से आया मरना मेरे हिस्से आया
तू नहीं मरा मैं मरा यू तू जी कर मर गया ओर मैं मर के जी गया !
*nk सनातन
■ भगवान है लेकिन कौन मानना चाहता है
सब कुछ उसके हाथ जीना -मरना वरना बेगरज है वो कौन मानना चाहता है
ये सच सर्वशक्तिमान भी बेटुक जानता है
इसीलिए कितना ही शाणा हो आदमी लेकिन उसके हाथों की कठपुतली मानता है ।
*nk सनातन