तुम्हे कही खो न दू ये खयाल….!

तुम्हे कही खो न दू ये खयाल….!

मेहबूब मेरे माशुका मैं तिरी
जुदाई नहीं चाहती थी
वो दुनियावी मजबूरी थी
मेहबूब मेरे कयामत से कयामत तक
इक दूजे पे मर मिटने वफा की कसमें थी
पर रियाया ये कैसी रस्मे थी
की बिछड़ना इक मजबूरी बन पड़ी थी
जिस्म से बिछड़ना था बिछड़ गए
रूह से तो बिछड़ना मुमकिन ही नहीं
न इस जन्म ना किसी जन्म जन्मांतर
तस्वीर जो सजा रखी है मन मंदिर गर्भ घर में
रोज सजदा करती हूं
तुम्हे यकि है वफा की मूर्ति हूं
रास्ते गुजरते है
लम्हे कटते हैं
पर उम्र मुश्किल कटती है
मेरे जहनो जिगर के मालिक
मेरे रूह ऐ आफताब
मेरे जलवों की बहार
तुम्हे बता दूं हूं किसी के दायर
सांसारिकता रस्म ए समाज
लेकिन दिल का चमन आज भी तेरे गुलो से गुलजार है
रोशनाई वही तुम्ही मेरे खुर्शीद
तलबगार मैं तब भी तुम्हारे अंगना की
तलबगार मैं अब भी तेरे कंगना की
तुम्हारे हमराज सायों में रहती हूं
सूरज की लू नही लावा से घिरी हूं
वाकिफ तुम भी मेरे हिले गीले हालातो से
शीत हूं पर ताप से नही
शीतलता से डरती हूं
खो न दूं तुम्हे उस रोज कहा था
आज भी मन में बस यही आलाप भजती हूं
दुनिया के दस्तूर से वाकिफ
जमाने से तब भी अब भी डरती हूं
इसीलिए बस इसीलिए की तुम्हे खो न दूं
अपने आप को पाने में भले खो जाऊ
खोऊ न तुम्हे अपने आप को पाने में
मेरे दिल के हमसाज ऐसा सिला दे खुदा
तो फिर किसी बात का कोई मैल ओ मलाल ही नही !
*Nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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