“तेरा भी क्या उपयोग है !?!? “
हां शीर्षक पर गौर फरमाइए
ये तीखा ओर तैरता सवाल है
जरा इस पर सोच गहराईयेगा
आदमी कहता है इन मुर्गों का
इन बकरों,भेड़ो,सुअरों का ,मछलियों का
क्या उपयोग है
चलो इनका कोई सटीक उपयोग नहीं
लेकिन गाय,ऊंट उनका तो उपयोग है
ओर तू उन्हें भी मार भोजन बनाता है
ओर उपयोग चाहे तेरे लिए नहीं है
ओर क्यो हो तेरे लिए
उनकी अपनी जिंदगी है
जिसे छिनने का हक तुझे कैसे है
तू श्रेष्ठ बुद्धि और बाहु बलि युक्ति संगत
इसलिए वो बेचारे निरीह तेरी करतूत से बेखबर
ओर खबर भी तो बेचारे क्या कर सकते
तेरे आगे कहाँ उनका बल
अगर ये बल तेरी तरह सामर्थ्यवान होते
तो क्या तूम उन्हें शिकार बनाते
वैसे सवाल उनका भी की
हे मानव तेरा भी क्या उपयोग है
झांक खुद को खुद में पायेगा कुछ नही
तेरी क्या जरूरत धरती को
तुझे पा के कौनसी निहाल है धरती
तेरे कारण कितने बखेड़े
झमेले, विध्वंस
हिंसा, हत्या,बेमानी , चोरी ,भ्रष्टाचार
अनैतिकता, स्वार्थ, ईश्वर के प्रति रोष-आक्रोश
नाराजगी, विद्रोह
तू सब पापों की जड़ खुद ही प्रायश्चित, पाप धुलन की रीत
खुद ने ही ईश्वर को गड़ लिया
खुद ने नैतिक-अनैतिक सिद्धांत में मोल लिया
भोतिकाई तेरी तृष्णा तू लालच स्वार्थ के गहना
इस धरती को दूषित-प्रदूषित में हमारी कोई नहीं भूमिका
हम निरीह,निर्दोष जिसमे ईश्वर बसता
तू देव-दानव का मिश्रण तू मन की कम
हां मन की कम मष्तिष्क की ज्यादा सुनता
हम सिर्फ प्राकुतिक स्वभाव जो दिया है
बस उसी पे चलते बसर करते हैं
वहां भी तू यमराज हमारी मौत तय करता है
तू यहाँ भी भैतिक तू वहां भी भौतिक
तू प्रकुतिता लिए कहाँ जीता है
भौतिक सुख शरीर की चिंता
इसलिए तू ईश्वर रच उसे मानता है
एक डर है जो तुझे हर वक़्त सालता है !
*nk सनातन