दानवी ख़याल हैं तो नर परिप्रेक्ष्य में क्यो था.. सतीत्व सिर्फ स्त्री …पुरुष का पत्तित्व.. !!??
अपच लेकिन आज के दौर का सुलझाउ पेच*
( मेरी कल्पना सामाजिक संतुलन के परिपेक्ष्य में)
[● मध्यकाल ओर अभी भी (अरब ) एक पुरुष राजा रईस के 10-20 पत्नियां सामान्य बात थी…द्रोपदी का एक मात्र 5 पति का उदाहरण….]
एक दम्पत्ति जिसके दो पुत्र एक पुत्री दुसरा दम्पत्ति दी पुत्र एक पुत्री… लिंगानुपात समाज मे चरम पर…. 100/ 60 का यानी लड़के 100 और लड़कियां 60… अर्थात 40 लड़को को कुँवारा जीना है … मरना है…
करे क्या ….
समाज मे साट-पाट यानी अदला -बदली का ट्रेंड चल रहा था यानी जिस दम्पत्ति के एक पुत्र एक पुत्री वो अन्य दम्पत्ति के एक पुत्र एक पुत्र से अदला-बदली में शादी हो रही थी… यानी भाई का साला उसकी बहन का पति यानी दोनो एक दूसरे के साला ओर जीजा …. यानी वक्त के मझबूर दौर में अजब -गजब चलन…
लेकिन दिक्कत वहां जहां दो बेटे एक बेटी…
क्या करे एक को कुँवारा रहना ही है …..
ऐसे में पांडव ओर द्रौपदी याद आये …. एक दम्पत्ति ने दूसरे दम्पत्ति को ये प्रस्ताव रखा कि मेरी पुत्री आपके दो पुत्रों की पत्नी होगी और आपकी पुत्री मेरे दो बेटों की पत्नी होंगी…. ताकि दोनो के बेटे सांसारिक सुख से वंचित नही रहेंगे… क्योकि अपने पास ओर कोई चारा नहीं है… ओर इंसमे या तो एक भाई अपनी बहन के लिए त्याग करे यानी कुँवारा रहे या बहन त्याग करे परंपरागत रीति -नीति को धत्ता बता कर…
ओर शारिरिक सुख दोनो बारी-बारी बाट ले और जिसकी सन्तान होंगी वो dna से बाप का नाम तय हो …. या एक वर्ष यानी पहली संतति तक एक भाई उस पत्नी का शारिरीक पति रहे मर्यादा पूर्वक ओर इसके बाद अगली संतान तक दूसरा शारिरिकरूप से अधिकृत पति रहे … जैसा भी हो वो आपस मे तय करे…
इंसमे स्त्री का शारिरिक ओर मानसिक उपभोग ओर उपयोग दोनो होंगे … लेकिन स्त्री धरती की तरह महान है … धरती का कितना उपभोग मानव करता है…
ये सब सार्वजनिक रूप से हो और समाज विवशता को देख स्वीकार करेगा ही… फिर किसी के तीन पुत्र .. चार पुत्र …एक पुत्री तो सीमा पांच या सात तय की जा सकती है क्योकि पांच पति का उदाहरण महान महाभारत में है ..ओर सप्ताह में सात दिन तो सात पति की भी संख्या तय की जा सकती है… हर पति -पत्नि एक समय तक सप्ताह के सातों दिन … माह … वर्ष भोग करते हैं तो अलग -अलग दिन शरीर अलग होगा पति का कर्म एक ही होगा…
लेकिन ये सोच पहल में लाना आसान नही है … महान महाभारत में उपलब्ध किवदंती के बावजूद ये चलन में नही आई… हां कुंछ आंचलिक समाजो में ये प्रथा है सुनने में।पढ़ने में आया है.. ओर जब बहु पत्नी समाज मे वाजिब थी एक समय तो बहु पति क्यो नही यानी एक औरत अधिक पति रख सके… पहले शौक से होता था अब मजबूरी से हो