■ गाँव उसका भी शहर हो गया ! ■
● किस्सा दाल में दाल न होने का ●
★ हास्य रस ★
गांव में एक वो दौर था अब ये दौर है
एक दिन एक गांव में जश्न था
ओर जश्न ओर दावत का जोड़ा सो दावत तो होनी ही
यानी शुद्ध हिंदी में कहूँ तो डिनर था
लेकिन अफसोस बुफे या बफर नही बैठक वाला भोजन था
वाह भाई जश्न-वश्न तो होते रहते हैं मुहुरत शुरत अनुसार
लेकिन भोजन का कोई मुहूरत नहीं होता
वाह भई जीमन जीमन का आग्रह हूआ
पंगत लगी और फटाफट परोसिये परोसने लगे
एक दो उत्साह फिर दो अतिउत्साही
एक दो सुम्मद और एक दो कन्ननी-काट
लेकिन चलो खाना अच्छा चल रहा था
अब जश्न में शामिल होते ही
हम पाकशाला में गए
मीनू शीनू का पता किया
तो मुँह में पानी आ गया
क्या था भई रंग बिरंगी शुद्ध डालडा की जलेबी,बूंदी, काली रोटी यानी माल पूवे
फिर पूड़ी, दो सब्जी ,दो दाल
सब्जी में एक मिक्स दूसरी सब्जी के राजा आलू की
दाल में उडद ओर मूंग की मिक्स
ओर दूसरी डाल अरहर यानी तुअर दाल
चावल के नाम गुजराती भात
फिर देशी छाछ का जीरे वाला रायता
अरे भई सुन कर मजा आ गया
ओर अब वो घड़ी थी डकारने की
जब खाने लगा तब दोने में दाल को देखा
क्या फ्लेवर दिख रहा था
कहना शुरू किया जलेबी ,बूंदी,मलपुवा उड़ाया
फिर जब स्वादू शौक पूरा हुवा तो
पेट का भी ख्याल आया कि भरना है
क्योकि मावा- मिठाईयों से पेट नहीं भरता
सिर्फ स्वाद ही आता है
तो पूड़ी का एक टुकड़ा ले दाल में डाला
तो लगा दाल पूड़ी पीस में आई नहीं
लेकिन मैंने निवाला मुँह में धर दिया
फिर मैंने दूसरा टुकड़ा ले उसी दाल ने दोने के पेंदे तक डाला
लेकिन मजाल है कि दाल का एक भी टूकड़ा आ जाये
मैंने दूसरी दाल में भी वही try की
लेकिन इसमें भी परिणाम वही
सिर्फ पानी था यार दाल अंदर थी ही नही
सब्जी को try मारी उसमें भी वही आईना
तब मैंने पूछा जो सुपरविजन कर रहा था
की भई ये ये क्या है
उसने कहा उडद-चना ,तुअर दाल
ये मिक्स सब्जी,ये आलू सब्जी
मेरा माथा ठनका तब उस दौरान जब परोसेने वाला आया दाल
मैंने उससे कहा कि चाय छानने की छन्नी ला
वो उत्साही था पाकशाला में गया और ले आया
मैंने उन सुपरवाइजर साब को बुलाया
ओर उनके सामने दाल छानी की भई
अगर ये दाल है तो इसमे दाल कहा है
उसने कहा साब बिल्कुल घुट गयी है
मैंने सब्जी भी छान के बताई तो उसने कहा
साब रस्सा ज्यादा है
क्योकि दाल गाढ़ी होती है तो लोग पतली मांगते हैं
ओर ज्यादा तर लोग सब्जी में रस्सा या रगड़ा ज्यादा मांगते हैं
तो मैंने कहा भई ऐसा ही था तो
तो तुंमहे पहले छंटनी कर देने थी कि
की पतली दाल वाले इधर
गाढ़ी दाल वाले उधर
रस्से दार सब्जी वाले उधर गाढ़ी सब्जी वाले इधर
तो बेचारा मैं गुलफाम तो गेंहू में गूंन पिसा न जाता
यू दाल की ललक से मारा न जाता!
*NK सेवक “सनातन”