~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

पाठक वर्ग अब वो नहीं रहा

■● अफ़्सोस ये की लिखने वाले बस लिखते हैं किसी ओर का पढ़ते नही है ! ●■

◆★एक अपच सत्य★◆

लिखने वालों का बस ये मुग़ालता
कि की वो सर्वज्ञ हो गये ,हर विषय के मर्मज्ञ हो गये !
इस विषय में अफ़लातून यानी महान दर्शनवेत्ता प्लेटो कहते
मैं जीवनभर एक शिष्य बने रहना पसंद करूंगा
यानी साफ गोया के वह कहते हैं जीवनभर सीखना जारी रखे
एक अनुभव की किताब,एक शिक्षा की डिग्री में सब पढ़ते हैं, सीखते हैं
लेकिन पाठ्यक्रम से इतर भी तो कई विषय कई ज्ञाता
उन्हें भी पढ़ना ज्ञान को सूरज बनाता है
दीपक हैं आप लेकिन रोशनी सीमित
बनो रवि,भास्कर, भानू,ख़ुर्शीद
के कहकशा बन जगती को करे रोशनाई !

लिखने वाले लेखक तो बहुत कुछ लिख रहे हैं;
लेकिन सवाल यही की पढ़ता कौन है ?

कविगण भी रच बहुत रहे हैं ओर सुना भी रहे हैं;
लेकिन सवाल यही की कौन सुनता है ?

सोशल मीडिया पर बहुत कुछ उड़ेल रहे हैं लोग;
लेकिन कौन देखता है, पढ़ता है ?

अपनी-अपनी डफ़ली अपना-अपना राग है ;
कोई तो पढ़े मनन से बस यहि आलाप है !

रचनात्मक विषय-वस्तुओँ की कोई कीमत नहीं ;
ऐसे-वैसे विषयो को सराहा जा रहा है !

जो वाकई अच्छा लिख रहा है ,
घास खा रहा यानी मलंग हो रहा है

सांठ-गांठ है तगड़ी जिसकी तमगे पा रहा है
इनाम-सम्मान से नवाज़ा जा रहा है !

ओर वो ख्यात कहावत चरितार्थ हो रही है ;
घोड़े घास खा रहे हैं ओर गधे गुलाबजामुन खा रहे हैं !
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अम्बेडकर के साये;
जो समानता-समता का हक दिलाये !

लेकिन असक्षमो को आगे लाए
ओर अगड़ा-पिछड़ा को बट-बंटाए !

वो भी सक्षमो को पीछे हटा कर
ये आईना ये प्रारूप ये विधान सब को सताए !

अम्बेडकर एक पुरोधा विधान में विधान लाये ;
की दलितों को आरक्षण राजकीय नोकरी में एक सीमित समय तक
लेकिन इस नेक सोच में वोट-बैंक के मुद्दे आड़े आये !

जो कोई भी राजनीतिक दल हो सब भुनाए
ओर चौहत्तर साल स्वतंत्रता के जाए !

लेकिन मजाल है आरक्षण पट जाए ;
उल्टे ये रोग और बढ़ते बढ़ता ही जाय !

जातिगत राजनीति के समीकरण बड़े उधड़े
देश मे ज्वलन्त ये विषम विकिरण बिगड़े !

बाबा दूरदर्शी होकर आरक्षण नहीं काश;
शिक्षा बिल्कुल मुक्त करवाते !
वो भी आर्थिक आधार पर मढ़ाये
तो आज देश के होते वारे-न्यारे !

यानी आज देश मे असंतुलन के तराजू न होते
न जातियों के ये वैमनस्य, रोष,आक्रोश,घुतबन्दी,
आन्दोलन होते !

न देश मे असक्षम ऑफ़सरशाह, नोकरशाह बढ़ते;
ओर प्रतिभाओं के साथ न्याय होता !

ओर योग्यता, गुणवत्ता के बड़े सोपान,आयाम होते ;
लेकिन यहां मनीषी से थोड़ी चूक हो गयी !

इरादा उनका तो नेक था लेकिन वो भूल गए ;
ये राजनीति है जिसमें दूषण-भूषण के पेच होते !

सत्ता के लिए ये राजनेता मगरमच्छ के आंसू
भेड़ियों सी फितरत रखते;
रंगासियार ये बड़े शातिर
सत्ता के लिए किसी भी हद-हथकंडा अपनाए !

झूठ, वादाफरोशी,
कूटनीति,धोखा,दिखावा इनके जेवर ,
सत्ता लोलुपता जाने ऐसे के शेर के मुँह आदम का खून,
शौक लग गया एक बार तो जाता नहीं !

इसलिए राजनेता सब एक जैसे एक ही इट के चट्टे-बट्टे ;
इसलिए ”सनातन” कहे-2 वाकई मुझे कोई भाता नहीं !!
★nk सनातन