फ़लसफ़ा ऐ अधेड़ जिंदगी !

फ़लसफ़ा ऐ अधेड़ जिन्दगी !
थक सा गया हूं , पक भी गया हूं
उम्र की अधेड़ दहलीज के पार हु
जिम्मेदारीयो के बोझ से अभी उबरा नहीं हूं
कुछ उलझने हैं पुरानी, कुछ नई मिलती रहती है
ये जिन्दगी हैं इसकी फितरत यही
चलती रहती है
यू तो अपरान्ह या मध्यान्ह के पहर
लेकिन बहुत कुछ देख चुका हूं
दुनिया के सब रंग-बदरंग
कमाया है सिर की चांदी ओर कड़वा-मिठा अनुभव या के तजुरबा
बीमारियों ने दबोउचा नही है पर दस्तक ओर घेरा जरूर है
खाना अब बो खाना नही इंसमे दवाइयों का डोज़ अनिवार्य है
पहले पड़ते ही नीद आती थी अब करवटें बदलने का दौर है
अब व्यस्त कम अस्त -व्यस्त ज्यादा का दौर है
मित्रो की संख्या घट गई हैं कुछ नए कुछ पुराने का ठौर है
स्वास्थ्य ही धन, की समझ अब हुई है
सब कुछ लेकिन असमंजस का दौर है
सामाजिक जरूरते बढ़ गयी है
रस्मो रिवाजो के अब दौर है
कभी डोलियों में कभी अर्थियो में शिरकत
ऐ जिंदगी तेरा ये कैसा धुंधला आईना
तू हुई सबकी मगर किसी की हुई नहीं है !
*NK सेवक “सनातन”