” आर्तनाद इक सबला का -बच्चों का बचपन छीन रहा है! ”
एक कवयित्री एक सभा मे कविता करने से पहले
चिंता व्यक्त कर रही थी
एक गहन ओर कालजयी
हां कालजयी विषय पर
वह कह रही थी –
बडे विषाद से
लिए आर्तनाद से
की साथियो-2
बाल मन को पढ़े और उन्हें कहे कि खूब
हाँ खूब बालमन की कहानिया पढे
बालपन छीन रहा है बचपन छीन रहा है
ओर बच्चे कुंठित लुंठित हो रहे हैं
मातृत्व छीन रहा है -2
बच्चे माँ -बाप से दूर हो रहे हैं
नोकरी पेशा महिलाएं बढ़ रही है
सुबह निकलती हैं शाम को लौटतीं हैं
मातृत्व अवकाश 3 माह से बढ़ 6 माह हो गया है
ओर फिर भी बच्चा बोटल का दूध पी रहा है
क्यो क्योकि 6 माह में बच्चा पूरा पल नही जाता है
जाने सरकार और चिंतको का क्या क्राइटेरिया है
शायद वो छह माह में ही बड़े हो गए हो
बदनसीब या खुशनसीब उन्होने सिर्फ 6 माह माँ दुध पिया हो
लेकिन इन सब पर भारी
आया , आया और पालना घरो का अप्राकृतिक दौर
अवसाद के वातावरण ,प्यार में फूल रहा है अबोध
जिस विषय को उकेरा था महान शो मेन
हां राजकपूर साब ओर फ़िल्म शराबी में
लेकिन महिला शक्तिकरण की शेखी
ये महिलाओं की जीत विजय है लेखी
लेकिन मोबाइल और टीवी में बच्चे डूब रहे हैं
लेकिन मेरी चिंता ये सब इसलिए
की बच्चों को कहानियां वानिया
लोरिया लाड दुलार सब नही मिल रहै है
मुझे डर है कि 40 साल बाद सरकार महिलाओं को नोकरी छोड़ने को न कहे कही
स्मरह रहे जो कवयित्री ये कह रही थी
वो स्वयं सरकारी नोकरी में थी और कवित अतिरिक्त शोखियाँ पेशा
जिसमे भी बाहर रहना पड़ता है अक्सर
जिसमे एक बड़ी कवयित्री यू बया करती हैं
हां जब वह एक कवि मंच पर विलम्ब से पहुचती हैं
लोग नाराज आयोजको के चेहरे पिले पड़े हैं
मगर साब कवयित्री थी अपने हुनर की
संभाला मंच थोड़ी हूटिंग के साथ कुछ मनचलों को
शुरू की कविता-
मैं लैट हुई मै लेटी थी
वो मेरे ऊपर लेटा था
मैं उसके नीचे लेटी थी
वाह मन चलो छिछोरों को
आह मजा आ गया सुन
फिर एक बुढऊ बोला
ठीक झुमका गिरा कर तेवर में-
हाय हाय फिर क्या हुवा
कवयित्री बोली फिर कुछ नही हुवा
मेरे लाडले नन्हे ने दूध पी लिया
ओर मैं अपना मातृत्व कर्म
हां धर्म निभा या आ गयी..
चलो मूल विषय की बचपना
ऐसे में महिला सिर्फ माँ ,गृहस्थ ही हो हो चिन्तन
हैं ये सोच का का गहनतम विषय
आज कौन मातृत्व- पितृत्व की चिंता करता है
भौतिकता की होड़ में सब खो रहा है
वृद्धाश्रम का चलन इसलिए बढ़ रहा है
नोकरी पेशे वाले अभिभावको का बेटा बेटी
छोटा हो चाहे वंचित वात्सल्य से पर बड़ा हो तब
पाता बहुत माल ताल
बड़े अभिभावको का बेटा
दोनो को मिली है भारी राशि पेंशन एक अदद बेसबब नोकरी के बाद
ओर जो बोया अब तलक
बस काटने का समय आया
खुद का हो बेटा चुकाने अहसास
तैयार हैं बेताब हैं वाह
बेटा-बहु अपने माँ-बाप को भी
उनके सेवा कर्म से मुक्त होने की सोच रहा
वृद्धा श्रम में भेज मुक्ति पा उनके भोतिक सुख को ओर पर दे
कर्ज चुकाने की सोच रहा।
कह तो दिया इतना
व्यक्त कर दिया मनन
लेकिन कौन है हममे से
यार घर मे एक कि नोकरी से
अह क्या होता है
निचोड यही की
भोतिक सुखों का रोना है
सिर्फ कहने को-2
दाल रोटी से जीवन कटता है !!!
* N K सेवक “सनातन’