~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

बुरखा भूगोल

**भूगोल ऐ बुर्का **
आईना ऐ घूंघट
आईना ऐ बुरखा साफ़ करू
क्या जरूरत इसकी वाकई
क्या रहा भूगोल पीछे इसके
आओ दोस्तो रुख साफ करू

आतंक ऐ नफरती दौर में
बुरखे पर आपत्ति जायज है
क्योकि आतंक में स्त्री भी अब
अब आम पुरुष के साथ है

धर्म की गोली में सब नशेमन
वो तनु वो इसरत चेहरा बने
स्त्री के नाम ये दाग आतंक के
हां आतंक के पर्याय बन हैं

आज मानवता शर्मशार है
करुणा की मूरत भी आतंकी
अफ़सॉस सोच से बाहर है
लेकिन हक़ीक़त इसकी भी वानगी

अरब देश जो हैं रेगिस्तानी
रेत धूल मिटी आंधी कड़ी धूप
अह इसके तेवर कड़े जीवन सुप
पीने ही पड़ते हर घड़ी लिए रूप

सो हिज़ाब या बुर्का बड़ी जरूरत
इन सबसे बचने यही हक़ीक़त
सो पुरुष भी जिसे शेख पोशाक
जो विशेष पहनते हैं लिए नकाब

आतंकी पुरूष ओर स्त्री
बात अब आम हो गयी है
कभी तनु कभी महबूबा
आतंक का जाम बनी है
इसलिए “सनातन” बुर्का ठीक है वहाँ
लेकिन अन्य प्रकुति में बोलो कहां काम
इसे धर्म से जोड़ना सरासर खाप ऐलान है
धर्म का बिल्कुल नहीं लेना -देना इसका क्यो नाम है

कोई महिला आतंकी फायदा इससे न उठाए
मासूम-निर्दोष इसका शिकार न हो समझे -समझाए

अगर अरब की तरह जहां रेगिस्तान
जहा प्रकुति-पर्यावरण की मांग स्थान
तो बेशक बुरखा जायज लेकिन अनिवार्य नहीं
राजस्थान के थार ओर गुजरात मे रण है कच्छ का
वहां भी महिलाएं और पुरुष है अरब की तरह
लेकिन यहां सिर पर पगड़ी है बचने धूप-बालू
महिलाएं सर पर ओढ़ती है जुल्फों का लिए हिसाब
घूंघट नहीं ना ही बुर्का ओर होती हैं सख्त जान

निचोड़ दलील ऐ ‘सनातन’ बुरखा धर्म से ना जोड़
ओर अगर नियत साफ खुद की तो बेशक बुरका ओढ़
फिर चेहरा ही हर किसी का मोहरा
पुरुष हो या स्त्री यही रूप ,आकर्षण, घर्षण का कारक
तो जहां न हो नीयते साफ बेशक बुरखा जायज
लेकिन आतंक न छुपा हो उस लबादे में
बस देश,दुनिया तेरी मेरी उसकी हमारी सबका चिंतन।
*NK सेवक “सनातन”