भसुरा के नाम असली शहीदी दिवस !
जिस जान के लिए हैं हम घर मे दुबके हुवे-हालांकि अपने लिए कम दुसरो के लिए ज्यादा -अंतरंग खोज का विषय है !!
[【 असली शहीदी दिवस पर ] ]
◆23 मार्च भसूरा दिवस◆
(भगत, सुखदेव, राजगुरु दिवस)
भाग सकते थे ये तीन सुरमा
हाँ फिरंगियों की कैद-शेद से
फ़रमान भेजा था नायक आजाद ने
लेकिन भगत ने विनयपूर्वक भेजा सन्देश में
नहीं सरदार-मित्र नहीं नहीं नहीं नहीं
देश के लिए सरे आम कुर्बान होना जरूरी है
जाने अपने देशजन की मादरे
वतन के लिए -2
जान तो तुच्छ मातृभूमि के लिए एक तोहफा है
यू कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने से अच्छा
तो मरना देश आजादी के लिए मरना
यू मरते तो कोन याद करता
दिन 23 मार्च हुवे कुर्बान
तो दिन -2 ये अजीम अहला आला बना है
मर कर अमर हो वही तो असल मे मरना है
वरना बेहिसाब ख़ाकसार हुवे कौन याद करता है।
My heartiest salute to these trio greatest revolutionaries of our great india… Inqlaab Jindaabaaaad
Long live india
◆NK Sevak “Sanatan”
[23/03, 17:26] Nk Sanatan: **** *युयुत्सु
धर्म -अधर्म का मुद्दा हर सभ्यता में रहा है
असभ्यत-सभ्य का द्वंद्व हर दौर में रहा है
कौन सभ्य कौन सभ्य वाद-परिवाद मुद्दा है
देव-दानव का अपना-अपना पैमाना रहा है
गुरु वशिष्ठ गुरु शुक्राचार्य हर काल मे रहे हैं
संसार महाऋषि कश्यप दिति- अदिति संसर्ग का परिणाम है
एक से देव एक से दानव का अवतरण हुवा है
क्या है धर्म क्या है अधर्म क्या नीति क्या अनीति
साधारण सरल सहज समजो तो उपज विधि
क्या हाँ जब सिंहराज मारे कीसी मृग को
तो वो उसका धर्म है हत्या कतई नहीं है
सिंह निर्दोष है क्योकि प्राकुतिक रूपेण उसे यही ज्ञात है
ओर असभ्य युग मे निर्दोष हत्या जायज
लेकिन सभ्यता का दौर सब साधन उपलब्ध
तो निर्दोषों की हत्या है क्या जायज
नहीं कतई नहीं सर्वाथ नहीं नहीं नहीं
आओ अब देखे महाभारत रामायण का माज़रा
क्या अनीति क्या सुनीति कुछ उदारहण आला
श्री राम द्वारा रावण वध जायज नीतिकर
लेकिन बालिराज का वध अवैध अनीतिकर
क्यो क्योकि एक प्रत्यक्ष अपराधी
दूसरा परोक्ष
फिर सवाल मित्रता ओर जरूरी दलन आततायी
छुपकर मारना श्रीराम की मजबूरी
क्यो क्योकि बाली था ब्रह्म वरधारी
ऐसे में एक धर्म बचाने एक धर्म अपनाना था
इसलिए बिगड़ा नहीं श्रीराम का बाली ने
लेकिन तय वो वर का उपयोग अनीतिगत कर रहा था
महा लक्षमण का नासिका कट शूर्पणखा खा
क्या कोई और विकल्प न था लक्ष्मण के शास्त्र में
केकयी जैसी ज्ञानी महारानी विवेक खोती
हां धर्मी होकर लेकिन खुद पुत्र भरत ने कहा अधर्मी
बात महाभारत की तो कुटिलता से भरी
पिता को पसंद अनिध्य सुंदरी सत्यवती
देवव्रत बने भीष्म निभाने धर्म बलवती
राज्य सर्वोपरि सो द्रोपदी चिर हरण के मूकसाक्षी
जब दोष पांडव का की धुत क्रीड़ा में हारे सब कुछ
क्या करे भीष्म द्रोण कृपाचार्य महारथी
पैतृक सम्पत्ति हर काल मे रही एक प्रपंच
ऐसे में कैसे छूट जाता महा कुरु वंश
फिर राज्य आधा आधा पर फिर क्यो होता सुयोधन राजी
दुर्योधन ही होना था उसको बन काज़ी
फिर क्या नियम था राजतंत्र
ज्येष्ठ संतान राजा की हक सिंघासन
तो हुकुकी हक किसका ????
सिर्फ सुयोधन का गर बात हो धर्म की
लेकिन फिर दूजा आईना
क्या ये की अन्ध धृतराष्ट्र ने खुद बिठाया अनुज श्री सिंघासन
ओर तब पांडुराज बनते हैं राजवर
ये एक राजनीतिक समझौता
की अंध कैसे करे रॉज सत्ता-जनता का
अब रानी कुंती का मन्त्र प्रयोग
ओर पांच पुत्र देव नियोग
ज्येष्ठ बनते युधिष्ठिर
तब जेठानी भी करती तप
ओर उनके भी होते शत सुत
यानी जाहिर है युधिष्ठिर ज्येष्ठ
लेकिन बात धर्म की
यदि धृतराष्ट्र होते राज्यासिन
तो चाहे पांडव के होता पहला पूत
वैधानिक राजा का ही होता राजा ज्येष्ठ पुत्र
लेकिन बात फिर धर्म की
पिता की संपत्ति पर सब कुछ आधा आधा
लेकिन फिर धर्म की बात
नहीं हुवा ऐसा कभी लिए राजतंत्र का आईना
लेकिन बात 14 बरस के वनवास
जो नहीं था जायज़ एक खून एक प्राण
फिर आना उनका सिर्फ प्रश्रय को आश्रय को
नहीं गवारा सुयोधन को सो था अब दुर्योधन
फिर समझाइस कोई और नही विष्णुअवतार
लेकिन केशव की कौन बाते मान
केशव जनार्दन दोनों के नाती समान
अब लड़े तरफ किसके छोड़ा स्वयं दुर्योधन भार
दुर्योधन एक संसारी भोतिक व्यक्ति मात्र
अगर न होता तो ये नोबत आती ही क्यो त्राण
इसलिए मति गयी मारी उस अत्याचारों दुराचारी
ओर मांग लेता है अठारह अक्षुणि यादो सेना
ओर दिया कृष्ण सुदर्शन को पांडव सेना
बात अब फिर धर्म – अधर्म की
भीष्म अपने राज्य धर्मवश
गुरु द्रोण-कृपाचार्य व्यवसाय वश
कर्ण दोस्ती – सम्मान वश
कह दे अधर्म के साथ
लेकिन धर्म के साथ
आपका पैमाना यहां कुछ भी हो
हाँ आपका अपना बनाया सजाया
उनकी नज़र में थे वो धर्म के साथ
ओर उन्हें ज्ञात है परिणाम मौत
लेकिन है निज धर्म की बात
युयुत्सु कौरव जा मिलते हैं प्रथमेव
पांडव के साथ
ठीक विभीषण भी हो लेते हैं श्रीराम के साथ
लेकिन युयुत्सु सौतेले भाई जन्मे वेश्या दासी गर्भ सुगंधा
सो रंज नहीं ठीक कश्यप पुत्र बने देव-दानव
असल मे भाई भाई लेकिन सौतेले
वाहक
लेकिन विभीषण तो पुत्र एक ही जमाता
कुम्भकर्ण महाबली सब जानते हुवे रहा अग्रज संग
एक प्रह्लाद देखे धर्म-धर्म विद्रोह पिता विरूद्घ
कृष्ण-दाऊ मारे स्व मामा कंस
धर्म होलिका खुद जले अधर्म नादां नेतिक बचे सलज
युद्धान्त पश्च जानो गांधारी दृष्टांत
मधुसूदन कृष्ण बताते पार्थ को
देख नर तू रो रहा है ले भ्रातृत्व खून
देख बड़ी माँ गांधारी
पेट ही सबसे बड़ा धर्म
हो तो सहज बन संसारी
दैहिक है तू लौकिक है
दैविक बात वसुंधरा पर
अफसोस है नादानी
नर मल उठाये गाय का
गाय चट कर खाये नर का
दोनों है धर्मी
अपना अपना आईना क्या धर्मी विधर्मी
शकूर- मक्खी को भाये मल- कीचड़
वो उसका स्वर्ग
इत्र, मधु ,बाग बगीचा हमारा स्वर्ग
बस ये दुनिया है
जन्म देता मरण देता महिश्वर
एक वो एक ये दोनों धर्म
ओर हम कहते- लेते सहज
क्योकी कोई नहीं विकल्प
उसकि मर्ज़ी उसका न्याय
जन्म मृत्य है धर्म- धर्म..!
NK सेवक “सनातन”
[27/03, 13:31] Nk Sanatan: ◆एक सेलेब्रिटी की वाह में आह मशहूर होने की बड़ी चाहत थी की पर हो न सका
चाहत मर गयी कि अचानक किस्मत चमका
मशहूर हो गया लेकिन मेरी निजता खत्म हो गयी
सेलेब्रिटी बना और पब्लिक पेर्सोना बन गया
तब सारे भोतिक सुख हो गए इर्द गिर्द
लेकिन अफ़सोस सारे प्राकुतिक प्राइवेट सुख खो गए
महज़ वो नुक्कड़ थड़ी पर दोस्तो के संग चाय की चुस्कियां
वो सड़क -चौराहे आलू-टिकिया चाट के चटकारे
वो सड़क और पैदल ,साईकल ,बाइक चलाना बिंदास दूभर हो गया
अब हालात ये की चारो तरफ 5-6 बाउंसर्स या रक्षक
फिर पुलिस द्वारा जेड प्लस सुरक्षा घेरा
हिन्दुस्तानी हुँ चाहे वहाँ कौने में लघुशंका कर लेता था
अब उस मोड़ पे खड़ा भी हो जाता हूं तो खबर बन जाती है
पहले बीमार होता तो हॉस्पिटल घण्टो लाइन में
इलाज होने से पहले लाइलाज़ हो जाता था
अब आलम ये की छिक भी आती है तो दो-चार नही एक दज़न डॉक्टर्स की टीम दौड़ी चली आती है
ये रुतबा ये पैसा चीज ही कुछ ऐसी है
एक आम को खास नहीं बहुत खास बना देती है
दूर से पर्वत सुहाने लगते हैं किसी ने ठीक ही कहा है
सोचता हूं कि फिर एक बार साधारन बन निज नैसर्गिक जीवन का मजा लूं।
*nk सेवक ” सनातन”
[08/04, 13:39] Nk Sanatan: *बदकिस्मती के पैर नहीं होते
(( कोरोना19 की लहर-थपेड़ ))
न मौत की वो ज़ालिम-पावन अंतिम रस्मे
न श्मशान-कब्रगाह पर हुज़ूम के मंझर ,चश्में
न रोने का, न सांत्वना का मौका
समाजी दस्तूर
न वो अपनो का विलाप न रोना-धोना अक्रूर ।
न नवमी , न ग्यारमी न उठामणा
न बारमे की धूप
न वो सामाजिक लेकिन अवैधानिक सुप
यानी अजायज खुजली में खाज मृत्यु भोज
सामाजिक कुरीति कहे या बहाना भूले गम-शोक
ना कही फातेहा न मज़ारों पे सोयम की धूप
ये कोरोना का संक्रमणकालीन संकट क्रूर खूब
ना अर्थी न जनाज़े न राम नाम सत्य का आलाप
पहले औपचारिक श्मशान तक अब वाकई प्रलाप
अब राम नाम आत्मिक पुकार सत्य बस सत्य
तब नहाने के बाद घर आते ही तब होता था खत्म
न अंतिम दर्शन न अपनो को पावन मुखाग्नि का क्रूर सुख
कब्र में खाक डाल जमीदोंज की
रस्म या इलाही मुख
सब कुछ बदल गया देखते ही देखते
कोरोना काल बन गया देखते ही देखते
जिंदगी छोटी थी भोतिक सुखों के मानिंद
कोरोना क्या छाया बड़ी हो गयी सब सुखों से इतर
विज्ञान उन्नत भौतिकताये उन्नत लेकिन विवश
राजा हो या रंक बस विवश विवश नहीं कलश
सामाजिक-धर्मनिरपेक्ष कोरोना लाएगा असल धर्मयुग
हो गए हैं हम अनैतिक बता रहा कलयुग
बात खत्म करू राहत फतेहअली की नज्म से
की तेरी आँखों का दरिया का उतरना भी जरूरी था
मोहब्बत भी ज़ुरूरी थी बिछड़ना भी ज़ुरूरी था
यानी ये महामारी शुद्ध करदे ह्रदय सब विश्वजन
ओर न्याय करे सभी से बन सच्चे मन , जन
*NK सेवक “सनातन”
[09/04, 14:59] Nk Sanatan: कोरोना रावण – यज़ीदी के साये
सारी योजनाएं धूमिल हो गयी हैं
ख्वाबो की ताबीर मटियामेट हो गई
जिंदगी जाने किस विकट मोड़ पे आ गयी है
सुधरेंगे हालात भविष्य के गर्त में है
हर व्यक्ति या कहे हर शख्स बस पशोपेश में है
जिन्होंने जी ली जिंदगी कुछ संतुष्ट कुछ अधीर हैं
जजिंदगियां दोषी-निर्दोष वो जाने लीलती जा रही हैं
मनुष्य बना पड़ा है चुनोती सर्वेश्वर के लिए
स्वर्गिक भौतिक सुखों से गुलज़ार है धरती पर
हर कोई दुनिया मे धर्म रखता है पर नाम का
भरपूर चिरौरी -मख्खन चुना चापलूसी
प्रार्थना पूजा अर्चना दुवा प्रेयर अरदास स्वार्थमयी धुरी है
धरती के आदमी को चाहिए भगवान ईश्वर प्रभु अल्ला
लेकिन जीते जी मर कर नहीं
क्योकि मरकर तो सब को स्वर्ग-जन्नत-हेवन मिलना हैं
लेकिन तय ये की हर आदमी को जिना है
वो भी अपनी क़ीमत अपने मूल्य अपने सपन
आदमी का धर्म ढकोसला स्वार्थपरक
धर्म है तो सिर्फ जानवरों का जो हैं अपढ़
कोरोनो-19 नेवल बरफ़ा रहा कहर क्रूर
दुनिया के हर दम्भी -धनी का नशा हो गया है चूर
लाशों के ढेर लग गए हैं सारे रस्मो रिवाज खो गए हैं
सिर्फ जान की ही तवज्जो है आदमी हर गहन सोच में है
दुनिया की आबादी तवारीख़ ऐ आज छः अरब
अब तलक आंकड़ा एक लाख पहुंचा बे सबब
संभले हम दुनिया सारी ओर फिर पा ले वो लय
लेकिन भौतिकता से इतर वो ही नैसर्गिक लिए
ओर सच्चे मन से नैतिक मूल्य अपना कर
ओर सभ्य कहते हैं तो दानवता-कपटता समूल मिटाकर
छः अरब है दुनिया मे लोग कोरोना ग्रास बनाएगा कितनो को
सम्पूर्ण दुनिया तो नष्ट नहीं होगी
हां आप हम देश कितने खुशकिस्मत है देखना है
फिर ईश्वर ने श्रेष्ठ जानवर बनाया है
जिसके आगे शेर-हाथी -कोबरा भी हुवा जब खिलौना है
पहले भी ऐसी भयावह रुग्णताये आयी छाई
लेकिन हम श्रेष्ठ जानवर ने बुद्धि प्रयास से पाटी हैं
ये गरल-विषम दौर भी पट जाएगा
कुछ सावधानियां जरूरी हैं
फिर देखे देर सवेर कोरोना नदारद जिन्दी की वो रफ्तार फिर आएगी
बस थोड़ा सब्र थोड़ा विवेक विश्वास
ओर सबसे ज्यादा आत्म शुद्धि जरूरी है।
*NK सेवक “सनातन”
[11/04, 12:55] Nk Sanatan: बक्रसुर,इंद्र ओर महर्षि दधीचि
( महावज्र की आवश्यकता कोरोना19 के खात्मे के लिए ))
देवदूत की आकाशवाणी– धरतीवासियों कोरोनो19 कहर ढा रहा है …इससे बचना है तो इसे समूल नष्ट करना होगा अन्यथा सृष्टि का अंत निकट है..
इस दानव के विनाश के लिए आप सब धरतिजनों के लिए सिर्फ एक ही उपाय है—
वो यह कि दुनिया के 1 करोड़ भ्रष्ट, अतिवादी, अलोकतांत्रिक नेता-रॉज नेता स्वयम अपनी इस इच्छा से दाह करे , 99
करोड़ भ्रष्ट ,दम्भी, अलोकतांत्रिक, क्रूर, अनैतिक संस्था प्रमुख , 1 करोड़ निकम्मे, कामचोर,आलसी, अपने काम से न्याय नहीं करने वाले, अभद्र, दानवीय प्रवत्ति , व्यावसायिक प्रवत्त कलुषित मानसिकता वाले , लालची , मौकापरस्त, जुल्मी,सूद खोर कर्मचारी ओर व्यवसायी आत्मदाह करे सार्वजनिक रूप से ओर फिर उन सबकी राख अपने आप ढेर बनेगी ओर फिर इक प्राकुतिक -दैविक ,आँधी- चक्रवात से वो राख पूरी दुनिया मे उड़ेगी ओर उस राख में अमृतिय सुगन्ध होगी जो कोरोना19 को समूल नष्ट कर देगी…
इसमें स्वयं को आत्मपरख , आत्मचिंतन ,आत्ममंथन द्वारा आगे आकर इस दुनिया को बचाने आहुति देनी होगी और जो भी ऐसा करेगा उसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और धरती पर उन्हें वैश्विक शहिद का दर्जा दिया जाएगा…
यानी वो सब महर्षि दधीचि की तरह शरीर का त्याग करें… इस कृत्य में आप सब महर्षि दाधीच नहीं क्योकि वह तो महान तपस्वी ,ज्ञानी ,नेतिक व्यक्तित्व और तुम सब पापी अतः आप सब है महान लेकिन
शुक्राचार्य -दाधीच कहलायेंगे क्योकि उन्होंने दानवों का पक्ष लिया ,वो महान ज्ञानी,तपस्वी लेकिन उन्होनें अनैतिकता लिए दानवों को शिक्षित किया..आप सबमे भी शुक्राचार्य बैठे हैं जिसमे सन्देह नहीं कि आप सब उस्ताद शातिर लेकिन अनैतिक मूल्य आपके जेवर है…
कुल मिलाकर आत्म बलिदान ही इस धरती के मानवो को बचा सकता है..
अब कुल मिला कर 3 करोड़ मात्र लोग ही इस दुनियां से समय से पहले जा रहे हैं…
दुनिया की आबादी 6 अरब
तो मौत का आंकड़ा ऊंट के मुंह मे जीरे के बराबर है..
तो ये सर्वशक्तिमान की तरफ से मेरा फ़रहान है…
नहीं तो शने-शने कोरोना 19,20,21,22,23,24 ओर 25 अंतिम फिर सब कुछ खत्म ..…बचना किसी का भी नामुमकिन क्योकि कि इस बीमारी का एक ही इलाज घर मे रहना लेकिन कब तक सब एक दूजे के पूरक ..
तो सोच ले ..इसके लिए आप के पास सिर्फ 15 दिन का समय …
इस परंपरा में ईसाई धर्म मे कॉन्फेशन सिस्टम है अन्य धर्मो में अन्य तरीके और जो नास्तिक हैं उनका जाना तो तय लेकिन यदि वो नेतिक रुप से समृद्ध तो कोई खतरा नहीं …आखिर धर्म का मूल उद्देश्य क्या है—
सिर्फ नेतिक मूल्यों का स्वपालन..
इति दैविक आकाशवाणी
आज्ञा से सर्वेश्वर-सर्वशक्तिमान
*NK सेवक “सनातन”
[12/04, 14:56] Nk Sanatan: साहित्य क्या है ??
साहित्य इस शब्द को संश्लेषित किया जाय तो स: हित यानी सब का हित
विवरणात्मक रूप से इसे समझे तो साहित्यिक का मर्म बहुआयामी ,विशद एवं वृहद है…
साहित्य मुख्य रूप से दो-शील ओर अश्लील
फिर शील में कई विधाओं का समावेश-शृंगार, वीर, प्राकुतिक या पर्यावरणीय, सामाजिक ,आर्थिक, औषधीय, खगोलीय,गणितीय, ज्योतिषई, भूगोलीय, वेज्ञानिकीय, मानविय, दर्शनीय,राजनीति किय, नैतिक ,धार्मिक, पारिवारिक, हासिल, लावणीय,समुद्रीय, जन्तुई, खाद्यान्य , कोकशाष्ट्रीय,नारकीय, पिशाचिय,भूतिया ,इतिहास ओर कई जो इस नश्वर संसार मे विषय परिलक्षित होते हैं या मनुष्य की सोच में है…
साहित्य दर असल एक व्यापक क्षेत्र है और ये समाज को दिशा देने व्यक्ति को अपना आईना दिखाने का परम स्त्रोत है
ओर दुनिया ने जो तरक्की की है उसमें साहित्य का विशेष योगदान है…
दुनिया समृद्ध साहित्य से लब्ध है जैसे
वैदिक ,ग्रीक, मिश्र,अरबी-फारसी,चीनी,बौद्ध बिबिलीक ,रोमन फिर प्राचीन मध्यकालीन,आधुनिक साहित्य जो प्रकाश स्तंभ हैं.…
रामायण,महाभारत, बाइबल, कुरान और महाकवि होमर का साहित्य वेद उपनिषद अरण्य पुराण ब्राह्मण आदि साहित्य मनुष्य जाति का चर्मोत्कर्ष है
साहित्य की दो विधा–
गद्य पद्य
इसमें पद्य का विशेष प्रभाव और स्थान रहा है क्योकि
ये लय राग ताल में गाया जाता है और गीत संगीत व्यक्ति के दिल ओ दिमाग पर मन्त्रमोहक असर डालते हैं
ओर गीता रामायण अपने साहित्य चरम परम् से बुराई पर अच्छाई पर विजय पर प्रकाश डालते हुवे नेतिक विकास और नेतिक मूल्य अपनाने पर फोकस करते हैं..
साहित्य का उद्देश्य धन कमाना नहीं समाज को मानव मूल्यों से उपर उठाना है यानी कि दैहिक मूल्यों से इतर दैविक मूल्यों पर जोर देना है…
कुल मिला कर साहित्य मानव का मानव से आत्मिक सामंजस्य का स्त्रोत है और सामाजिक परस्परता अपनाने का माध्य है
ओर इसकी भाषा जरूर अलग है लेकिन उद्देश्य आह एक ही है
इसका कोई धर्म नहीं धर्म बस यही की सच्चाई हो अच्छाई हो
दुनिया मे।
*nk सेवक “सनातन”