रक्तबीज सा कोरोना वायरस !
बक्रसुर,इंद्र ओर महर्षि दधीचि
( महावज्र की आवश्यकता कोरोना19 के खात्मे के लिए ))
देवदूत की आकाशवाणी– धरतीवासियों कोरोनो19 कहर ढा रहा है …इससे बचना है तो इसे समूल नष्ट करना होगा अन्यथा सृष्टि का अंत निकट है..
इस दानव के विनाश के लिए आप सब धरतिजनों के लिए सिर्फ एक ही उपाय है—
वो यह कि दुनिया के 1 करोड़ भ्रष्ट, अतिवादी, अलोकतांत्रिक नेता-रॉज नेता स्वयम अपनी इस इच्छा से दाह करे , 99
करोड़ भ्रष्ट ,दम्भी, अलोकतांत्रिक, क्रूर, अनैतिक संस्था प्रमुख , 1 करोड़ निकम्मे, कामचोर,आलसी, अपने काम से न्याय नहीं करने वाले, अभद्र, दानवीय प्रवत्ति , व्यावसायिक प्रवत्त कलुषित मानसिकता वाले , लालची , मौकापरस्त, जुल्मी,सूद खोर कर्मचारी ओर व्यवसायी आत्मदाह करे सार्वजनिक रूप से ओर फिर उन सबकी राख अपने आप ढेर बनेगी ओर फिर इक प्राकुतिक -दैविक ,आँधी- चक्रवात से वो राख पूरी दुनिया मे उड़ेगी ओर उस राख में अमृतिय सुगन्ध होगी जो कोरोना19 को समूल नष्ट कर देगी…
इसमें स्वयं को आत्मपरख , आत्मचिंतन ,आत्ममंथन द्वारा आगे आकर इस दुनिया को बचाने आहुति देनी होगी और जो भी ऐसा करेगा उसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और धरती पर उन्हें वैश्विक शहिद का दर्जा दिया जाएगा…
यानी वो सब महर्षि दधीचि की तरह शरीर का त्याग करें… इस कृत्य में आप सब महर्षि दाधीच नहीं क्योकि वह तो महान तपस्वी ,ज्ञानी ,नेतिक व्यक्तित्व और तुम सब पापी अतः आप सब है महान लेकिन
शुक्राचार्य -दाधीच कहलायेंगे क्योकि उन्होंने दानवों का पक्ष लिया ,वो महान ज्ञानी,तपस्वी लेकिन उन्होनें अनैतिकता लिए दानवों को शिक्षित किया..आप सबमे भी शुक्राचार्य बैठे हैं जिसमे सन्देह नहीं कि आप सब उस्ताद शातिर लेकिन अनैतिक मूल्य आपके जेवर है…
कुल मिलाकर आत्म बलिदान ही इस धरती के मानवो को बचा सकता है..
अब कुल मिला कर 3 करोड़ मात्र लोग ही इस दुनियां से समय से पहले जा रहे हैं…
दुनिया की आबादी 6 अरब
तो मौत का आंकड़ा ऊंट के मुंह मे जीरे के बराबर है..
तो ये सर्वशक्तिमान की तरफ से मेरा फ़रहान है…
नहीं तो शने-शने कोरोना 19,20,21,22,23,24 ओर 25 अंतिम फिर सब कुछ खत्म ..…बचना किसी का भी नामुमकिन क्योकि कि इस बीमारी का एक ही इलाज घर मे रहना लेकिन कब तक सब एक दूजे के पूरक ..
तो सोच ले ..इसके लिए आप के पास सिर्फ 15 दिन का समय …
इस परंपरा में ईसाई धर्म मे कॉन्फेशन सिस्टम है अन्य धर्मो में अन्य तरीके और जो नास्तिक हैं उनका जाना तो तय लेकिन यदि वो नेतिक रुप से समृद्ध तो कोई खतरा नहीं …आखिर धर्म का मूल उद्देश्य क्या है—
सिर्फ नेतिक मूल्यों का स्वपालन..
इति दैविक आकाशवाणी
आज्ञा से सर्वेश्वर-सर्वशक्तिमान
*NK सेवक “सनातन”