~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

लॉक डाउन पीरियड पर सृजनात्मक दायित्व

लॉक डॉउन पीरियड पर सृजनात्मक दायित्व
सर्व प्रथम लोकड़ाउन का सृजनता से कोई लेना देना नहीँ है क्योकि सृजनता किसी लोक डाउन को मोहताज नहीँ। रचनाधर्मी लोग निरन्तर समसामयिक ,कालजयी और सार्वभौमिक विषयो पर ओर कल्पना की उड़ान की बिला पर देश समाज ,विश्व समाज के कल्याण और उत्थान के लिए लिखते ही रहते हैं। प्रत्येक काल की सम-विषम परिस्थितियां रचनाकारो, कलमकारों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में कोरेना काल भी अछूता नहीं रहा है।कोरेना काल की इन विषम परिस्थितियों पर लेखकों और रचनाकारो ने खूब लिखा ओर विषय अभी भी जवलंता लिए हुवे है। विशेष बात कोरोना महामारो ने इस श्यामल रंग में श्वेत रंग भरने का प्रयास किया है ओर एक आम व्यक्ति को भी इस दुष्कर काल मे अपीलीय लिखने को उद्धत या प्रेरित किया है। सोशल मीडिया एक आम व्यक्ति के लिए एक सहज और सरल और वृहद प्लेटफार्म या मंच है जिसका कवि-लेखक के साथ -साथ उसने भी भरपूर उपयोग किया है। इस अवधि में लोकड़ाऊन के तहत सारे धर्म के आस्था के केंद्र बंद ओर मिलना- झूलना बंद यानी सामाजिक दूरियां ,धार्मिक दूरियां लेकिन पहले ये दूरियां अनोपचारिक थी अब औपचारिक । कोरोना की वैधव्य दशा ने नेतिकता के पट खोल दिये हैं ल लोग मुक्त मन से अपने सामर्थ्य से लूट रहे हैं जरूरतनंदो, मजलूमों के लिए।अदब के परस्तीतो ने कोरोना के अंतर्गत सभी मानवीय मनोवेगो को दिल और आत्मा से छुआ है। साम्प्रदायिक खाई कही उभर कर आई तो कवि वृंदो ने बेबाकी से इसकी निंदा ओर रोष लेखनी में प्रकट किया। साहित्य ओर संगीत गरल मानवीय मूल्यों से ऊपर है और सिर्फ सहिष्णुता ओर लोकतंत्र का खुला आसमा है। मानवीय परस्पर सहयोग को कवि और लेखक समाज ने महिमामंडित कर आम और खास वर्ग को प्रेरित किया और लोग भरपुर हाथो से यानी तन-मन-धन से मानव मूल्यों में रंग भरने को उत्सुक हो पीर पराई जाने के पहलू को छुआ। इस काल मे राजनीतिक स्याह रंग भी उजले नज़र आये और कवि और लेखक वर्ग ने जहाँ सही वहां तारीफ़ ओर जहां अनर्गल हुवा भत्सर्ना की। कुल मिलाकर कवि बिरादरी ने व्यावसायिक मूल्यों से इतर नेक या खुदाई अंजाम दिया है। इस अवधि में साहित्य ओर समृद्ध हुवा है। सृजन का दायित्व हर काल मे चुनोतीपूर्ण रहा है ऐसे में चाटूकारिता जीती है तो सच्चाई लड़ी भी है।कुल मिलाकर जुगाड़ू कवि-लेखक समाज दैविक या इलाही मूल्य लेकर जमीर की हद तक गया है कि दिन को दिन व रात को रात कहा है। सता पक्ष और विपक्ष को भी साहित्यकरो ने इस संकट की घड़ी में एक होने और परस्पर सहयोग के लिए सराहा वही मजदूर ओर प्रवासी लोगो की असुविधा के लिए लताड़ा भी हैं।
यानी एकमेव रूप से कहे तो –
बस ऐसे में ही मानवता यदि आती है-2
तो ”सनातन” ये अँधेरा कायम रहे।
यानी कोरोना से ही मानव मूल्य जिंदा होते हैं तो ये कोरोना न मरे…. कभी न मरे।
इस दुनियां में इलाही करमो की ही गुहार हैं। सच्चे मानवीय मूल्यों की ही पुकार है।
हो सब कुछ नैतिक तो देखो ये जहां बहार है।
*NK सेवक “सनातन”
काव्यांगन , उदयपुर