■ बस यूं ही ख्याल ऐ दुनियावी ■
मैंने FB पर तमाम प्रतिक्रियाएं व्यक्त करना बंद कर दिया है
यानी तमाम सोशल मीडिया पर आना बंद कर दिया है !
जो कभी मेरा शोक शगल ओर जुनून था
तो जाहिर है लाइक करना भी बंद कर दिया है
क्योकि व्यावसायिक बाज़ार में लाइक्स भी प्रायोजित हैं
साफ है कोई मतलब नही है पोस्ट करने से
जो चीजे आसान या फिर फ्री मिलती हैं
कोई वैल्यू या वजूद नहीं रखती !
सोशल मीडिया यानी बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना
सफलता मानो मुग़ालता वाकई समय की बर्बादी
अपनी अपनी डफ़ली अपना अपना राग
पढ़ा उन्हें ही जा रहा है जो ख्यात हो गए हैं
या फिर किस्मत फाडू है
या फिर प्रोमोट किया जा रहा है
सिफारिश के तार जिनके गहरे है
पेल हर कोई रहा लेकिन वह किसी का पढ़ नहीं रहा है !
जाने कोई हो तीसमार खां
महाज्ञानी, प्रकांड विद्वत
महान प्लेटो ,बेकन की तर्ज पर कौन है आज ?
बस आप ही आप गुरु
बाकी सब लघु !
सोचिए वाकई आपकी क्या है बिसात
अपने आप को महाज्ञानी मानने का भ्रम
कई लोग पाले हुवे है
मैं भी कोई अपवाद नही
असल मे अदना सबका आपका कद
व्यक्ति जीवन भर रहना चाहिए ज्ञान मिमांशु,
हरदम हो प्रशिक्षु,
हर घड़ी पठाकू,
पढ़े – सार सार को गहि रहे,
थोथा देहि उडाय !
किसी ने कहा भी है हम मूर्खो से भी सिख ले सकते हैं!
पढ़ने से ,प्रतिक्रिया सकारात्मक-नकारात्मक मन मे उभरती है और व्यक्त होती है तब
कहाँ किसी को नुकसान !
सकारात्मक पुष्टि से ऊर्जा उत्साह मिलता हैं ;
नकारातमक प्रतिक्रिया से माझने का मौका मिलता है !
लेकिन ये दुनिया जिसमे मैं भी हूँ
पाता हूँ 100 मै से 101 निष्ठुर,अजज्बाती, छिछले ज्ञानी ,दम्भी,लोभी,ईर्ष्यालू
काले मन ,चतुर ,शातिर लोग !
मैं तो अपने आप को भोला ,सीधा-सादा, सरल कहता हूँ
लोग क्या राय रखते हैं मेरे बारे अलग बात है !
सोच पर शौच यह की आगे बढ़ जाय कैसे वो !
बहुत कम लोग हैं जो किसी को आगे बढ़ाते हैं !
ओर हकीकत यही की या तो आगे वाले को धक्का या धोखा दे आगे बढ़ जाओ !
या फिर कछुए की तरह धीरे से चुपचाप निकल जाओ
मानवीयता का बाजार अब खत्म हो गया है !!!!
स्वार्थ के हाट लग रहे हैं
क्षणिक ओर् तनिक सफलता को बढ़ा -चढ़ा पेश किया जाता है
तिकड़म ,सीफारिश, भाई-भतीजावाद, रुतबा,रसुखि का बोलबाला
यानी अनाचार ,अपच प्रकुति व्यवस्था ,व्यवहार
मैं अपने आप को उत्साही पाठक मानता हूँ
ओर लोगो को पढ़ सकारात्मक-नकारात्मक प्रतिक्रिया देना मेरा धर्म रहा है
लाइक भी देता था
लेकिन धर्म यही ट्रीट फ़ॉर टेट
अगर वो लाइक न करे तो हम क्यो करे
लेकिन इस सोच से उसमें ओर हममें क्या फर्क रह जायेगा
मन मंथन करता है
लेकिन लौकिक नियम ही यही
नही तो वो शख्स अपुन को को ऐरा -गेरा , आलतू -फालतू समझ जाएगा
संसार का नियम
सम्मान पाना है तो सम्मान दो ;
प्रसंशा पानी है तो प्रशंसा करो !
ओर यदि अच्छे पाठक है तो दिन को दिन रात को रात कहो
लेकिन दुनिया में बहुत कम लोग हैं जो आलोचना पसंद करते हैं
ता फिर पचा पाते हैं !
लोग 100 में से 101 तारीफ ही पसंद करते है
ओर यही दुनियावी त्रासदी है !
मेरे इस मन्तव्य ओर मतैक्य का मर्म क्या
बस यही की -2
जो भी पढ़ने मील
समय निकाल कर एक बार जरूर पढ़े
क्या पता किस पाठांश ने आपको जेवर मिल जाय
अच्छा दर्शन,ज्ञान ,अनुभव मिल जाये !
*NK सेवक ”सनातन”