~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

Quill pen, inkwell and open manuscript pages

NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

व्यंग्यम रामबाणम अनुरंजक पर नीतिपरक

★ व्यंग्य बाण लेकिन अनुरंजन★
◆ सूरज बांटा, चंदा बांटा
धरती भी..
शुक्रिया क्योकि इन्हें बांटना मानव- तेरे बस मे नहीं !
हवा को बांटने का ख्याल भी तुझे आया
मुझे(सर्वशक्तिमान) को ढूंढने ओर भाग्य असंतुलन ,मृत्यु ,बीमारी,बुढापा को लेकर मुझसे सवाल-जवाब करने कोसने का दण्डित करने का खयाल भी तुझे आया लेकिन अभी तक ये तेरे बस में नही हालांकि तू बड़ा पुरजोर यत्न कर रहा है!!!◆

ब्रह्मांड से आकाशवाणी- हे संसार के मानव सुन …
मैं ईश्वर ….आज रात 00: 01 बजे से किसी भी हिन्दू को कोरोना नहीं होगा….
तभी एक जेन– ईश्वर धरती के सारे हिन्दू ही
ईश्वर- हाँ सिर्फ हिन्दू ओर सुन तू जैन है …..
जैन– नहीं नहीं प्रभु हम तो हिन्दू ही है….
ईश्वर– हिन्दू कैसे तुम्हारे पंथ में तो ईश्वर की कल्पना ही नही तुम तो मानव को ही पूजते आये हैं…
जैन– नहीं नहीं प्रभु हमारे 22 वे तीर्थंकर नेमिनाथ जी भगवान कृष्ण के सौतेले भाई बलभद्र के भाई थे…
प्रभु– लेकिन जब तुम हिन्दू हो तो तुमने अपने आप को अल्प संख्यक कैसे घोषित करवाया
जैन– ओ प्रभु ये तो आप जानते हैं ही कि हमारा पेशा व्यापार है इसमे सब जायज है
अब आप देखे हमने ब्याज को प्याज सुना और हम आज भी जमीकंद प्याज नहीं खाते..
ईश्वर– तो तुम्हारे आदिनाथ उर्फ पार्श्वनाथ ने हिन्दू होने के बावजूद नया पंथ क्यो शुरू किया ये विद्रोह नहीं
जैन- प्रभु ये सब तो आप जानते हैं
ईश्वर- तुच्छ प्राणी जानते तो हम सब कुछ है लेकिन हम तेरे मुख से सुनना चाहते हैं
जैन- प्रभु क्षमा … वो ये हुवा था कि ये जो ब्राह्मण जो अपने आप को श्रेष्ठ जाति मानते थे पढ़ने यानी ज्ञानी होने का अधिकार केवल अपना बना रखा था देववाणी संस्कृत केवल उन्हें आती थी जो वो सीधे ईश्वर से साक्षात का दावा करते थे और अन्य जाति वर्ग को ढकोसलो ,अंधविश्वास,
अतिशय, कर्मकांड में झकड़ रखा था और शाप से भयभीत कर रखा था
अतः ऋषभदेव जो चक्रवर्ती सम्राट थे को वैराग्य उतपन्न हुवा ओर उन्होंने तपस्या शुरू कर दी राज-पाठ तज कर…
ओर उन्हें कैवल्य यानी इश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुवा ओर वो तपस्वी होकर उपदेश देने लगे ..उन्होंने सभी निम्न जातियों को जिसे ब्राह्मण तुच्छ अधम नीच मानते थे को ईश्वर की बराबर सन्तान मान गले लगाया और इस तरह जैसे आज SC-ST वर्ग बाबा भीम राव को देव समान मानती है जिन्होंने उस वर्ग को समानता का अधिकार दिलवाया ऐसे ही हम उन्हें मानवीय भगवान मान पूजने लगें ओर उनके बाद एक के बाद एक मुनीश्वर उनकी परम्परा को कायम रखते गए जिसमे 24 तीर्थंकर तक इन्हें महामानव मान पूजा जाता है और इसके बाद मुनि परम्परा जारी है ओर वो मुनि मंदिर बनवाते है और अपने नाम जिनालयों का नान आचार्य विपीनगिरी जी,आचार्य राजेन्द्र सूरी आदि नाम रख खुद को अमर करने की चाह को पूरा करते हैं और उन तीर्थंकरों के साथ अपने गुरु वो अपने गुरु की प्रतिमा जिन मंदिरों में लगवाते है अब मुझे नहीं पता कि इस्लाम के जिन ओर हमारे जिन में क्या अंतर है ये सिर्फ नाम का इत्तेफाक है या कोई अंतर संबंध है!!
*ईश्वर- चलो ठीक है तेरे ज्ञान से हम इम्प्रेस हुवे
तुझे हिन्दू मान हिंदुओ वाला प्रभाव ही रहेगा
जैन अब हिन्दू– जय हो भगवान जय श्री राम!!!
तभी एक मुस्लिम बोला- मोहतरम एक संशय है हमे आपने अपने आप को ईश्वर बताया जबकि हम तो आपको न तो मानते हैं न जानते हैं
*ईश्वर- फिर भई बात क्यो कर रिया है ?
मुस्लिम- देखे ईश्वर जी वैसे हम जानते हैं आपको लेकिन दरअसल हम मानते खुदा को हैं…
तो अभी जो आकाशवाणी की वो सिर्फ हिंदुओ पर लागू होगी
ईश्वर- हाँ सिर्फ हिंदुओ पर ही लागू होगी
इस्लामी– अरे भगवन ऐसा क्यों हमारे साथ ये अन्याय क्यो
*ईश्वर- क्योकि तुम तो इस्लाम के अनुयायी हो..
मुस्लिम– अरे भगवन वो तो ठीक है लेकिन हमारे पुरखे तो हिन्दू थे जो कन्वर्ट हुवे थे इसी ब्राह्मण वाद छुआछूत आदि से..
ओर ये हमारे बहुत बड़े लीडर ओर एक मौलाना डंके की चोट पर कहते हैं
लीडर का नाम तो फारुख अब्दुल्ला साब है ओर मोलनसाब मलिक रसूल ..ठीक से नाम याद नही आ रहा..
तो जाहिर है इस्लाम ग्रहण से पूर्व हम हिन्दू थे
*ईश्वर– लाभ लेने अपना धर्म नकार रहा ह….
मुस्लिम: नहीं नहीं प्रभु आप खुद ही देख ले 2500 साल पहले ही तो इस्लाम का प्रादुर्भाव हुवा था इससे पहले तो धरती पर वैदिक अग्नि धर्म ही था फरहाओ यजिदीओ जारथुस्त्रो का इतिहास देख ले…कंधार जहां मामा शकुनि राज था और आर्यावृत दूर- दूर तक था..
*ईश्वर- चल तुझे भी मूल रूप से हिन्दू के तहत मान तुझ पर भी यही नियम लागू होंगे
मुस्लिम– इंशाअल्लाह शुक्रिया परवरदिगार
ईश्वर– हँसते हैं
तभी बौद्ध दलाई लामा ओर वेटिकन चर्च प्रमुख पोप– अरे प्रभु हमारा क्या
ईश्वर- नहीं तुम दोनों
हिन्दूओ में नहीं आते
दोनो– अरे प्रभु जो अभी हमारे धरती भाई जैन-इस्लामी ने जो दलील दी तर्क दिए वही इतिहास भी तो हमारा भी है
*ईश्वर: जब तुम सब मेरी आकाशवाणी का लाभ एक समान लेना चाहते हों तो फिर आपस मे ये पंथ- जाति-भाषा, देश – विदेश, तेरा-मेरा क्यो
ओर मन ही सब मानते हैं कि मैं ही ईश्वर, प्रभू, परमेश्वर, परवरदिगार, अल्लाह,खुदा एक ही हूँ
धर्म तो सन्त ,पुजारी, मौलवी,मौलाना ,इमाम ,उलेमाओ, मुनियों के व्यापार है यदि ते इसे कायम नहीं रखेंगे तो उनका वजूद कैसे रहेगा!!!
*NK सेवक “सनातन”

Back to the Treasure Index