द्रोणाचार्य ने कईयों को पढ़ाया लेकिन अर्जुन सिर्फ इक ही बना…. गुरु द्रोण ने एकलव्या को नहीं पढ़ाया लेकिन अर्जुन सम महावीर बना~तो शिक्षा में शिक्षक के रोल या भूमिका पर बहस की किसे क्रेडिट दे अध्यापक या खुद विद्यार्थी को!!!!
किसी भी विद्यार्थी की उच्च , मध्यम,औसत सफलता में किसी भी अध्यापक का आंशिक हाथ भी नहीं होता जैसे कोई डाक्टर बना,कलक्टर बना, इंजीनियर,साइंटिस्ट बना,एंबेसेडर बना…सुनते है…
तो यदि उस अध्यापक का हाथ और योगदान होता तो सभी विद्यार्थी उसके बी पढ़ाए गए इन उच्च पदों पर पहूचते…..!!!!!
इन पदों पर पहूचने वाले वे विद्यार्थी या तो पठाकू थे,अध्ययन के प्रति जुनूनी थे,जन्मजात कुशाग्रबुद्धि थे, अध्ययन के प्रति लगनशील,उद्यमी थे और उससे ज्यादा वो तकदीर के धनी थे !!
बात कड़वी है और बहस के घेरे में है लेकिन ये मेरा अनुभव,मंथन ,दर्शन है और मेरा मतेक्य है ….पेशे से मैं भी इक अध्यापक रहा….हालाकि गुरु के रूप में प्रस्तुत रहा और शिक्षा देना उद्देश्य रहा लेकिन प्रशासन और प्रशासक ~शिक्षक गुरु को पसंद नही करते वे सिर्फ कोर्स समय पर पूरा हो विद्यार्थी रटे और रिजल्ट अच्छा यानी श्रेष्ठ रहे विद्यार्थी रट के पढ़ के या श्रेष्ठ बुद्धि से रैंक लाया अच्छा परिणाम लाया ….और आप श्रेष्ठ बेस्ट टीचर हो गए और इनामो की जड़ी बेस्ट टीचर….
*Nk सनातन