*तब भी ,अब भी – आईना यही था यही रहना है !
सीता हरण तब भी हुवे
चिर हरण द्रौपदी के सरे आम हुवे
सुभद्रा हरण प्रायोजित रहे
अम्बा- अम्बालिका- हरण बलवती इरादतन रहे
कुटिल मंथरा तब भी हुई
केकयी जे स्वार्थ तब रहे
20-30 शादियों का चलन
तब रहा
शुक्र है अब शौक है पर कानून का डंडा पड़ा
हिरण्यकश्यप -होलिका तब भी रहे
कंस की काल क्रुरता तब रही
रिश्तों के नाम ये कैसे विभत्स रहे
यानी उस काल मे भी स्वार्थ के परचम रहे
इस काल मे ये सब कृत्य मिले-झूले चल रहे
यजिदी तब भी हुवे
रोम तब भी चले
नीरो बंसी बजाते रहे
जीसस सूली चढ़ाये गए
कोपरनिकस, गेलिलियो सताए गए
सुकरात जहर पिलाये गए
कुल मिलाकर इतिहास दुर्दांत है
विभत्स है काला है
ओर सामने हमारे ग्रंथ हैं
ये रोपित हैं इरादतन की
कि मानव हर युग का
इससे सबक ले
सच्चाई पर चले
धर्म हो क्रियाकर्म में नही
वरन व्यवहार में हो
आचरण में हो
मन-मस्तिष्क में
लेकिन धर्म है पर धर्म नहीं
धर्म ग्रंथ हैं पर शिक्षा को
पर लेता कौन है
चलता कौन है
बाबाओ, संतो ,मौलवियों ,धर्म गुरुओं का अपना व्यवसाय है
चलती रहे अपनी दुकान बना रहे ऐश ओ आराम का मकाम
अंध भक्त झकते रहे
बनाते रहे चमत्कारी – महान !
दुनिया कई मुद्दो ओर
सदियों से जल रही है
चारो तरफ असंतुलन की तुला या तराजू
बस फिर भी दुनिया चल रही है
सांप चूहा मारकर जिंदा है
ओर बाज सांप को मारकर
ओर बाज को तेन्दुआ मारकर जिंदा है
यानी सत्य तो यही
प्रकुति संतुलन की गहन व्यवस्था है
ओर ये किसी की नहीं
उसकी जिसे हम भगवान- खुदा कहते हैं
की आला स्वीकार्य -अस्वीकार्य व्यवस्था है
यहां श्रीराम-श्री कृष्ण अवतारी हुवे
मोहम्मद -हुसैन-रूमी मूसा पैगम्बर हुवे
ये सब अजीम महाआदम हुवे
मरने से पहले खूब मरे नैतिक मूल्यों के लिए
आज अमर हैं मरे पर मरे नही
जिंदा हम सबके दिलों में
उज्ज्वल प्रकाश हर दम बिखेरते
लेकिन हमारे काले मन कहां सुधरते
इसलिए उन अवतारों-पैग़म्बरों से ऊपर
अज्ञात अदृश्य लेकिन महसूस की जाने वाली शक्ति
सर्वशक्तिमान जिसे सब कहते हैं
को दुनिया के मन – आचरण सुधारने
कभी सुनामी ,कभी भूकम्प तो कभी
दृश्य महामारी इलाजमय प्लेग
लेकिन कभी अदृश्य
लाइलाज कोरोना से परिचय कराना पड़ता हैं
ओर सच्चाई पर चलने की सबसे बड़ी प्रकुति धरा पर रखी हैं उस अदृश्य महाशक्ति ने
जिसे मौत कहते हैं
लेकिन श्मशान- कब्रगाह
खाक-राख ऐ सुपुर्द
राम नाम सत्य कुछ समय
इंशा अल्ला पाक सब कुछ समय
ओर फिर वही संसारिकत की ऊंचाइयां
ओर खो जाता है नश्वर मानव
नश्वरता में बढ़-बढ़ कर
एक शेर क्रूरता से मार रहा निरीह हिरण को
वैसे कोई भी मर्डर प्यार से नही किया जाता
क्रुरता ही इसकी प्रकुति है
मैं सामने खड़ा हूँ हाथ मे बंदूक थामे शिकार के हिरन के
लेकिन बीच मे शेर आ गया शिकार के
उसकी मजबूरी मेरा शौक
मारू किसे शेर को बचाने हिरन
ओर फिर मैं ही मारू उस हिरण को
शाम को नॉनवेज डिश दावत को
सोच में “सनातन” की क्या सही है क्या गलत
ये सब ऊपरवाले की माया है
बकरे-हिरन- मछली-मुर्गो का क्या उपयोग तर्क यही
इसलिए मार कर खाना जायज
ओर इस योनी से शीघ्र मोक्ष देकर
करता हु एक पुण्य का काम
ईश्वर के नाम बस एक यही सुकून
*NK सेवक “सनातन”