सावन की फुहार-बसन्त की बहार!
जिंदगी के हसीन मोड़ पर अल्हड़ मैं ये समझा कि मोहब्बत क्या है ।
हो मुझे भी मोहब्बत किसी से चाह है
की देखा तुझे तो यू लगा तू ही मेरा प्यार है ।।
तू इस बात से बेखबर की तू ही मेरा खुमार है ।
की तू ही मेरे खिले चमन की बहार है ।।
राज छुपाते कब तक भंवरे की तरह मंडराते कब तक ।
मन मे सिहरण आखिर जताते कब तक ।।
तू मेरा भौतिकी में रंगा प्राकुतिक प्यार था ।
तू ही मेरी जिंदगी का हाल ऐ बेकरार था ।।
हमराज थी तुम मेरी हमसफर हो गई ।
हमसाया जब रस्मो में बंध गई ।।
दिल जा निसार था खूबसूरत पड़ाव था
की चाह की सफर ये चलता रहे।।
यू ही रंगीनियों में बहता रहे ।।
दम निकले तो साथ एक दूजे की बाहों में ।
साथ रहे हर जन्म दुवा खुदा से वाहो में ।।
*nk सनातन