~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

ज़माने की तर्ज तब भी अब भी वही है कुछ नहीं बदला है

ग़ज़ल वो जो हैं झूठ कहती है!
( जफ़र गोरखपुरी साब की मशहूर ग़ज़ल -” इक वो भी ज़माना था इक ये भी ज़माना है….”जिसे ख्यात ग़ज़ल गायक “चिट्ठी आई है फ़िल्म नाम फेम द्वारा गाई गयी है पर एक प्रतिक्रियात्मक गद्यात्मक तकरीरि ग़ज़ल )

लोग यूँ ही कहते हैं जमाना ये था वो था
ये न था मगर वो था
पैसा न था सुकूँ था
रिश्ते नातो का क्या खूब चलन था
भाई चारा आपसी सामंजस्य सद्भाव था
सुविधाएं कम थी मगर सुख चैन था
शांति थी समझौता था
अमन था देवत्व सा सौहार्द्र था
*सब झूठ कहते हैं लोग
जमाना पहले भी जालिम था
जमाना अब भी जालिम है
जमाना तब भी ऐसा था जो आज भी बेगाना है निर्मम ,स्वार्थी बेईमान रूखा सा
कुछ नहीं बदला है
सब वो का वो है आज भी
रात के खाने को गर्म कर दूसरे बर्तन मे धरा है बस
या यूं कहें पुरानी शराब को नई बोतल में भरा है
बदला है यू लेकिन कुछ नहीं बदला
नया है पर बस नाम नया कुछ नही बदला
वो ही स्वाद है, वो ही रुआब है, वो ही जख्म ओर वो ही मवाद है
सच कहूँ ”सनातन” जीवन आज भी बैराज,बैराग ,तार-तार है
कहते हैं ये राज ऐसा ये सरकार ऐसी
क्या अशांति क्या तन मार महंगाई
क्या धरने,आंदोलन ,
प्रदर्शन , हडताल
सब बातें हैं सिर्फ सूरते बदली है आईने वही है
ये दुनिया तब न बदली तो अब क्या खाक बदलेगी
जीवन तब भी जटिल था अब भी जटिल है
कुटिल ही प्रकुति ,कुटिल है हम सब
कोई नहीं शरीफ है
चोले ओढ़े है सब साधु संत पंत कबीर
साई , नानक, दादू , खुसरो रुबाई मीर
सब के दिलो में वही रावण ,कंस यजीदी शैतान सी शैदाई कमाई
वही हिंसा -प्रतिहिंसा
आरोप -प्रत्यारोप, वैमनस्य ,दुश्मनी
फर्क आज भी वही कथनी ओर करनी
भुखमरी ,बेरोजगारी, गंदगी, बीमारी
जलजले, सैलाब तब भी आते थे
अब भी आते हैं
सिर्फ़ अंदाज बदले हैं
लोग तब भी पीड़ित बेमौत मरते थे
अब भी मरते हैं
प्रकुति पर पहले भी ज़ोर न था
अब भी नही है
भौतिक ऊंचाई मार्लो की मास्टर कृति डॉक्टर फास्टस्ट में पहले ही बया है
बताओ ”सनातन ” बदला क्या है !?
कुछ नहीं लोग या शख्स ऐ खास गजल उस्ताद जफर गोरखपुरी लिखते हैं पकंज “उदास” यू ग़ज़ल गाते हैं
ओर दर्शक ,श्रोता यू ही आह पर वाह कर रहे हैं !
गुलूकार सदियों से यही से यही लिख रहे हैं
मौसीक़ी के उस्तादों का यही आलाप रहा है
ये कूचे ये नीलम घर दिल कशी के
ये लुटे हुवे कारवां जिंदगी के
ये दुनिया गर मिल भी जाये तो क्या है
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान कितना बदल गया इन्सान
देखो ये खतरे की घड़ी है
भाइयों में जंग छिड़ी है
ये मक्कार ये अंधे प्रदीप लिखते हैं
ऐ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले
ऐ भाई जरा देख के चलो
कसमें वादे प्यार वफ़ा मन्नाडे अलापते हैं
तो फिर बदला क्या है कुछ नही !
झूठ कहते हैं तुलना के तौर
यानी पाक- साफ़ कुछ भी नही बदला है
न नजर , न नज़रिया चीजे कुछ नहीं
वो कल भी बिकती थी आज भी बिकती है
सूद, ब्याज खोरी आज भी
मेलो -त्योहारों में
उपभोक्तावाद कल भी था आज भी है
तो मोल में तन -मन
तब भी बिकते थे
आज भी सूरत वही है समाज की
बस नीचौड़ यही की दुनिया यूँ ही चलती आई है और यू ही चलती जाएगी
रामायण,महाभारत ,
याहुसेन-यजीदी ,वक्रसुर के किस्से कब के है
गर आप इसे ऐसा ओर उसे वैसा बताते हैं
जरा गौर करे और मुझे बताए खरा !
मैंने- आपने ज्यादा नहीं मगर थोड़ा तो जमाना देखा है
ओर वही अय्यार ,मक्कार, खुदगर्ज़, बेगैरत ,क्रूर जमाना है
हाँ बदला है कुछ तो लोकतंत्र का आईना है
दूध का धुला तो ये भी नहीं
लेकिन चलो नाम की सही ओरो से अच्छा है
आज इसी की तस्वीर की कि जाति से जाति नहीं वरन आदमी आदमी से मिलता है
यानी जात -पात, छुआछूत का भरम कहाँ रहा है
समानता ,समता का क्रम बदस्तूर जारी है
मान लो कुरीतियां इस दौर में हारी हैं
शिक्षा -ज्ञान का दौर है अंधविश्वास रूढ़ियाँ अब कारी हैं
रीति-नीति में बदलाव समझदारी है
कुल मिला कर दुनियां अब वो नहीं पर वो ही है
हर आत्मा में भौतिक सवारी ये हर वक्त की खुमारी है
अंततोगत्वा झूठ कहते हैं लोग
दुनिया आज भी वही कल की मारी है
यानी वही है वही
ये बदलते वक्त की यारी याने वही दुनियादारी है !
मंदिर ,मस्जिद, गिरजे अलग है चाहे अब भी
लेकिन स्कूल औषधालय एक है सबके लिए
डॉक्टर ,टीचर ,नर्स की कोई जात नहीं है
सरकारी, निजी कर्मचारी की कोई बिसात नहीं है
लोकतंत्र की वाह वाह बस मानवता सबकी औकात है
खून डोनेट किये जा रहे हैं जाति-बिरादरी वहां शर्माती है
खून की कोई जात नहीं कोई धर्म नहीं
हॉस्पिटल में ये मानवीय सौगात है
कुछ बातों को ,मुद्दों को लिए मानवता शर्मशार हैं
नैतिक मूल्यों की नहीं कोई पाठशाला
द्रौपदी चिर हरण ,कंस मामा पहले हुवे है
सुग्रीव बाली सगे होकर भी लड़े है
कई बेटों ने अपने पिताओं को कैद में डाला है
पितृधन हेतु हर काल मे परिवार लड़े,बिखरे हैं
वृद्धाश्रम आजका ऐसा ही एक परोक्ष आईना है
अनाथआश्रम ,गरीबी ,
भुखमरी,
घात-बलात आज भी
तन-मन है तो ये दानव-देव का दस्तूर जवां था और रहेगा
बदले वो बदले वो कहते हैं हम
बस हम बदले कब, जब जमाना बदलना है
बस विश्वास से सदियों पुरानी ये दुनिया इसी क्रम में
कलयुग ,द्वापर, सतयुग त्रेता
बस काल का यही मिला झूला चक्र ,वक्र आईना है !
*N K सेवक “सनातन”