~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

Quill pen, inkwell and open manuscript pages

NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

दड़बा क्लास !

भारतीय रेल और जनरल क्लास कम्पार्टमेंट ओर पैसेंजर -एक व्यथा

रेलयात्रा जनसाधारण की जनता या सामान्य क्लास
यात्रा साधनों में सिरमौर पहली पसंद फर्स्ट क्लास
विशेषतः सामान्य यात्रियों की धड़कन झक्कास
लेकिन चुनोतिपूर्ण ऐरे-गेरे के लिए नहीं अनुप्रास

यू तो अनुभव लेकिन एक ओर यात्रा का कड़वा अनुभव
स्लीपर रिज़र्वेशन बुक कराया 5 सीटो का सप्ताह पूर्व
ऐन वक्त हुवा कन्फर्म वो भी दो जन का अह
ओर वो भी कमाल रेल विभाग का एक सीट 16 एक 21 पुह

बताओ भई अब माँ अलग ,बहन अलग
बीबी तलाक़ से पहले ही जुदा, थलग-विलग
माँ रहते भी बच्चे अनाथ ज्यो धरती ओर चंद्र
बैठने को मजबूर अलग-थलग कैसे दे दुहाई
फिर वापसी उसी से क्योकि हाथों हाथ रिज़र्वेशन कहा होत भाई
अब रेलगाड़ी का इंतज़ार आ गयी समय पर महरबानी
आश्चर्य क्योकि कुख्यात कहे या विख्यात रेल भारत लिए लेट लतिफाई
भीड़ बहुत यानी एक अनार सौ बीमार कैसे हो भरपाई
क्योकि डिब्बे सिर्फ़ चार मात्र दो अगाड़ी दो पिछाड़ी
ऐसा क्यो समझ से परे क्यो छद्म व्यवस्था दुखदाई
जबचारो डिब्बे की एक जाटसाथ क्यों नहीं भाई
यानी परेशान जनरल यात्री बेचारे लिए अकुलाई
आगे जगह न मिले तो भागे पीछे एक किलो मीटर हक्का-बक्का
ओर दुर्घटना की संभावना फिर रेल छूटी-छूटाई पक्का
इस तरह पीड़ित जनरल बोले तो सामान्य ही साई
वातानुकूलित यानी AC ओर स्लीपर यान वालो की हां नहीं कोई परेशानी

अब रेल के दो डिब्बे आगे के मुर्गी के दड़बो की तरह खचाखच
या रेवड़ भेड़ो की आधी भेड़ियों भैंसों -सांडों की
यानों कुछ कुलीन, शिष्ट कुछ अशिष्ट लड़ाक
कोई ऐडजस्टेबल कोई कोपेरेटिव लेकिन कोई अभद्र बलात
ओर स्प्ष्ट करे तो सेकंड क्लास नाम से
असल मे ये थर्ड क्लास हालात से
अंग्रेजो के गुलाम बैठते थे कभी इस दोयम दर्जे में
अफसोस इतिहास आज भी रोता है गांधी के साथ ज्यादती से
लेकिन वो मानवता के खिलाफ दुर्व्यवहार
हां बना विद्रोह का कारण उठा अहिंसा का सशक्त हथियार
ओर विश्व इतिहास दुहाई देता गांधी के इस जेवर को
मर्म मेरी इस तक़रीर का या यू कहो स्वस्थ दलील का
की भारत की जनता आज भी संकीर्ण केटेगरी का शिकार है
इंसमे राजनीतिक मंशा ओर वोटबैंक लोमडाआई ख़याल है
या शुद्व अंग्रेजी में कहे तो “दर्जे” का शिकार हैं
अपने ही देश अपने ही रॉज में ये अन्याय है
अंग्रेजों के ही द्वारा किया जाता ये हश्र तो शिकवा क्या होता
शिकवा ये इसलिए कि है ये अपनो के द्वारा अपनो पर जुल्म
पहले भी यही था अंग्रेजो द्वारा कम भारतीय द्वारा ज्यादा
हां भारतीय भारतीयो द्वारा ज्यादा दासता का दास था
आज सत्तर साल आजाद भारत को हो चले
गुलामी इस रेल यात्रा में दिखती है सिरे से
गरीब,विपन्न ,मजबूर ,लाचार,खे-दुत्त कुछ कंजूस कुछ कैसे
यात्रा करते हैं थर्ड क्लास डिब्बे में तथाकथित सेकंड दर्जे के नाम पर
हालांकि यात्राये नहीं मगर मंझील पूरी होती आइ है सत्तर सालों से
सुकून जो होता हैं यात्रा का असल वो बरसों से गायब है
अपने ही लोकतंत्र में जनता पीड़ा की भाजक है
कभी रेलमंत्री रेलमंत्री होने का आईना देखे
कितनी पीड़ा झेली है समझे ओर दोष दूर करे
अब तक न प्लेन वालो ने सुना न केम्ब्रिज न हैरो वालो ने
अब चायवाले आये पर वो भी उन धनिकों के साँचो में
साब बुलेट चलवा रहे हैं जिसमें बैठना एक सामान्य यात्री के बैठने की नहीं ओकात
ओर लगभग क्या बिल्कुल मुश्किल, दुर्लभ
क्योकि बेचारे आमजन ने आज तक स्लीपर नहीं देखा
ओर बुलेट तब क्या वह वहन कर पायेगा
हा सरकार सब्सिडी देगी फिर कहेगी त्याग करो
“सनातन” का ये दर्शन इस समस्या के हल में
3rd जिसे आप सेकंड कहते हैं
4 नही हर ट्रैन में 10 लगाओ
तो बेचारे हम बेचारो की तरह यात्रा न करे
ओर हम अपनी रेलवे ओर सरकार को कोसे नहीं गर्व करें
या फिर एक पूरी ट्रैन ही 2nd वलास की ही चले
ओर सुविधा चाहे हो सेकंड दर्जे की लेकिन ये गाली दूर करे
नाम फर्स्ट क्लास रख ले तो एक आम यात्री फ़ख़्र करे
जिससे रसूख अलग AC में मिडल उच्च क्लास उसमे बेठने पर शर्म न करे
हिंदुस्तान में समय का क्या महत्व वो रेल यात्रा से जाने
सिग्नल मिलने में कभी मिनिट ओर घण्टे
ओर पूरी यात्रा में ऐसा एक नहि 5-7 बार आम बात है
भई दुनिया इतनी तरक्की इतना बजट इतनी जम्बो आय
फिर भी रेल ट्रैक सिग्नल के मोहताज
खड़ी रेल में अनिच्छित गाने वाले,किन्नर ,भिखारी, हॉकर
भीड़ में ओर भीड़ बढ़ाते
ओर बार बार नया चेहरा पैसा मांग चीढ़ बढ़ाते
कोई सरकार इस बिंदु को हल करें
ओर धनी जनता तो सूझी है
कुछ सुख -शांति हम मार्क्स की चीख वाली जनता को भी दे दे।
*nk सेवक “सनातन”