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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

द ग्रेट स्टेचू ऑफ यूनिटी इन गुजरात,इंडिया

” द ग्रेट स्टेचू ऑफ यूनिटी इन गुजरात”

(लौहपुरुष वल्लभ भाई पटेल की आत्मिक पुकार)

मै कृषक परिवार का साधारण व्यक्ति
बारडोली के फिरंगी जुल्म ने दी शक्ति
नाम से ही मैं पावन-भावन-बामन वल्लभ
जो सब दर्शनों ओर कुटनीतियो का है पल्लव
नाम से ही मुझमे कृष्ण सुदर्शन थे
प्रज्ज्वलन
ओर बारदोली में जीत मेरे खेडुत बिरादर उज्ज्वल
मेरी रहबरी में जीता समर वो मैं नही थे असली वल्लभ
अब सिरमौर गांधी ने दे दिया बिरुद सुघड़
पुकारा गया तब मुझे एक स्वर लोह-पुरूष
तब अच्छा लगा नाम पर बड़ा फक्र हुवा सहर्ष
लेकिन आज मेरे जन्म दिन पर स्वर्ग से मंथन
की मूरत मेरी -स्टेचू ऑफ यूनिटी देशजन मढ़े स्थल ले मंचन
लागत देखते ही मुझे हुवा बड़ा क्रंदन
लगभग 30 अरब ओर समय अमूमन 4 बरस
गांधी की भाषा मे ये वक्त ओर धन की बर्बादी का सबब
मेरे देश के लोग भूखे -नंगे सो रहे हैं ऐसे में मुझ पर खर्च भारी
हम अमरीका-चीन नही जो विकसित लबालब
हम गरीब आज भी अर्थव्यवस्था चरमरायी
तो जायज नही इस तरह की नादानी
कोई घर जला कर भी होली खेलता है भई
सरकार के सिरिमोरो की ये सियासती रणनीति रास नही आई
जब मंथन किया तो लोह पुरुष कहलाने का भी मलाल आया
क्योकि लोहा एक धातु जो जंग भाया
ओर मिट्टी ही है जिसे उच्च ताप पर उबाला जाता
फिर पिट -पिट कर सांचो में ढाला जाता
ओर मैं ओरो को पीटने वाला पीटा जाऊ
नाम पर मुझे बड़ा भारी तरस आया
सरदार मुझे कहा, क्या सरदार वल्लभ से है बड़ा ?
क्या वल्लभ ही मेरा परिचय अपने मे सम्पूर्ण न था?
सरदार कह श्री वल्लभ को कम आंका
चलो अब आपने मुझे 85 फीसद तांबे में ढाला!
ओर तीन ओर धातु का मिश्रण आला
हां आपने मुझे लोह पुरुष से ताम्र पुरुष बनाया
जिसमे लौह का तनिक भी अंश नही पाया
मैं एक किसान का बेटा ओर किसान काया
हाँ किसान मेरे देश का दुखी आत्महत्या काला साया
क्या मैं ये कृत्य मेरी इस मूरत से देख सकता हु ?
नही कदापि नही सिर्फ मूक दर्शक बन कुढ़ सकता हूं !
उधर ब्रिटेन भी ब्रेकसीट के बाद पैसे की कीमत समझा
ओर वैश्विक चिरौरी से अलग दहका
आर्तनाद में कहा इससे किसानों का किया होता भला
हथियार पर पैसा खर्च करना या ऐसी मूर्तियों पर
चाहे हाथी हो कांसीराम ओर बाबा अम्बेडकर बराबर
चाहे गांधी ,नेहरू , इंदिरा ,राजीव कामराज
सी रामचंद्र या जयललिता या अनन्य सूरज
ओर जीते जी भी कोई अमरता का करे दुस्साहस कर ले!
मूरत वो भी बनवा ले कोई आदमकृत क्या हर्ज है
ओर बिगाड़ लेगा कोई क्या किसका साहस है
जब पर्यटन ही उद्देश्य ओर स्वच्छ भारत का मिशन
तो अच्छे खासे द्वीप को प्राकुतिक ही रहने दिया होता
अब दररोज पंद्रह हजार पर्यटक का हुजूम उमड़ेगा
तो स्वछता के क्या होंगे पैमाने होंगे देश समझेगा
मनुष्य ही अस्वछता का सबसे अहम कारक
क्या ऐसी मूरत से मेरी जो छवि है सकारक
100साल से है जो वो ओर बढ़ेगी बन तारक
शायद सरकार की भारी आय से बात हो मारक
हाँ देश-जनो मैं शायद लोह से स्वर्ण पुरुष कहलाऊँ
ओर अगर यह भी व्यापार देश के आदर्श तो पछताऊँ।
**NK सेवक “सनातन”