****विवाह *****
विवाह*
वाह शब्द की वाह से कौन नहीं है वाकिफ़
वाह के पहले लग जाये यदि वि तो तौफ़ीक़
विवाह के साथ ही बढ़ जाती हैं वाहे
फिर बच्चे ओर साथ ही जिंदगी के झमेले
ओर कशिश तो रहती है लेकिन बढ़ जाती आहें
ओर कभी घटती कभी बढ़ती जाती हैं चाहें
शादी के बारे कहावत मशहूर अपने भारत मे
जो शादी का लड्डू खाये पछताए न खाए वो भी
फिर खा के ही क्यो न जाए पछताए
शादी पर एक शौध अनुसार फायदे हज़ार
लेकिन नुकसान भी इतने ही सब जोड़े गिनाए
लेकिन ये सांसारिक जिंदगी की जरूरत
फिर समाज मे भी आपका रुतबा हैसियत बढ़ाये
संतान सुख से पहले तो इतराये मुस्कराए
फिर बेटी है तो जाने कैसा शौहर घर मिले
सौच सौच के घबराए ओर मन मसोह के रह जाये
चाहे तब बेटी खुद के घर आ जाये ऐसा शायद ही हो पाए
क्योकि सांस सांस ही होती मां तो किताबो में
हर बेटा पहले मा-बाप का बागवान के किस्से सिर्फ फिल्माए
लेकिन हां आधुनिकता की हवा में दस फीसद ऐसी नालायक ओलांदे
लेकिन निचोड़ यही की विवाह जश्ने ख़ुदा
परिवार में खुशियां बढ़ाये
ओर बिन ब्याह या सांसारिक रस्म के बहु कैसे आये
हैं जो मा बेटे या बेटी की थी कभी वो भी बेटी किसी की
विवाह ही तो है जिससे ये गुलशन महकाये !
*nk सेवक “सनातन”