इसका अर्थ ये की आयुर्वेद का महत्व नहीं !
आयुर्वेदाचार्य-होमियोपैथी डॉक्टर अब लिख सकेंगे एलोपैथीक दवाइया ओर मेडिकल शोपवाले भी
[आयुर्विज्ञान के जनक आचार्य चरक की ये देंन बहुत समृद्ध है …लेकिन आयुर्वेदाचार्य एलोपैथीक दवाई लिखे ये जायज नही … क्यो क्योकि एक तो आयुर्वेद का फिर मतलब नहीं रह जाता…ओर जिस विषयवस्तु का आपने अध्धयन ही नहीँ किया कैसे अधिकृत किया जा सकता है..]
ख़बर सच्ची है पक्की है लेकिन अपच है अदूरदर्शी है और मरीजों – रोगियों के साथ खिलवाड़….
क्यो क्योकि जिस विषय को आपने पढ़ा ही नही कैसे न्याय कर पाएंगे वो डॉक्टर…. तो फिर एलोपैथी वाले होमियोपैथी ओर आयुर्वेदिक दवाइयां भी लिख लेंगे क्या … ओर मेडिकल स्टोर वाला भी दवाई दे बिना डॉक्टर की पर्ची न्यायसंगत बात नहीं है…. जो व्यक्ति जिस विषय का विशेषज्ञ है उससे बेहतर न्याय कर सकता है …. ठीक है सामान्य रोग जैसे मलेरिया, वायरल , फ़ूड पॉइज़निंग , दाँत दर्द , सामान्य बुखार वगैरह – के लिए ये बात हो सकती है लेकिन असामान्य रोग होने पर वो चिकित्सक साधारण दवाई लिख ले तो साधारण रोग असामान्य में बदल सकता है … अतः सरकार का ये कदम घातक है….. ओर वो डॉक्टर भी कहे कि नहीं हम हमारी विधा की ही दवाई लिखेंगे जो हमने पढ़ा है… कल कोई मरीज मर गया या हालात और बिगड़ गई तो मरीज के घरवाले हम पर मुकदमा कर देंगे… ओर मरीज जो पढ़ है कहे कि डाक्टर साब आप अपनी डिग्री की ही दवाइयों लिखे… ओर यदि मरीज अपढ़ है तो डॉक्टर अपने विवेक से अपने ही फन की दवाइयां लिखें….
सरकार के इस निर्णय से ये साबित होता है कि आयुर्वेद और होमियोपैथ दवाइयां एलोपैथी की तुलना में कमतर हैं…. ये भारतिय आयुर्वेद का अपमान भी कहा जा सकता है और होमियोपैथी का भी…
ओर मेडिकल स्टोर वाले बिना डॉक्टर की पर्ची के जब मरीज को दवाई दे सकते हैं तो फिर डॉक्टरों की कहा जरूरत.. एक फार्मासिस्ट ही दवाई लिखे हॉस्पिटल की भी कहां जरूरत… तो फिर वो जोलाछाप डॉक्टर भी माननीय हो … ओर कुछ कम्पाउंडर ओर अप्रशिक्षित लोग किसी डॉक्टर की डिग्री लगा क्लिनिक खोल कर बैठे हैं और आश्चर्य की बरसो से ये गौरखधंधा करनेवाले लोग सरकार की गिरफ्त से अछूते है …. ओर हैं भी तो भ्रष्टाचार ,घुस ,रिश्वत बड़े सहज साधन जो इसको हरी झंड़ी दिखा देते हैं…
*nk सेवक “सनातन”