आसमा के जंग ज़मी पर
◆आसमा के जंग जमी पर◆
सारी लड़ाइयां जमाने की जमाने के लिए जमीन की ही तो हैं
जमीन की ही ऊँचाइया पाने को गिरता आदमी इक त्रासदी ही तो है
जमीर की छोड़ो “सनातन” यहां कई तलवाचांट बिरादरी है
उड़ते है बिन डोर ओर गिरते है बिन डोर
कितना नादां ,नासमझ उड़ने का भ्रम पाले आदमी है
खतरे सब ऊंचाईयो के ही हैं ऐ जमाने सुन
आ अपने आप मे मिला खुद खुदाई ओर तोल
क्यो की आसमा में जीते या हारे आना जमी पे ही है।
*NK सेवक “सेवक”