~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

Quill pen, inkwell and open manuscript pages

NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

जज साब जमानत हँस रही है

■ जमानत हँस रही है और बलाती मौज ऐ दरिया ! ■
[ असम की गुवाहाटी न्यायिक खंड पीठ ने मुख्य न्यायाधीश अजित बोरठाकुर की रहबरी में बलात्कारी ‘उत्सव कदम ‘ जो कि आई आई टी डिप्लोमा के बीटेक का छात्र है ने अपनी सहपाठी छात्रा से कॉलेज परिसर में ही बलात्कार किया जो पुख्ता सबूतों के आधार पर साबित भी हुवा को
जेल से जमानत पर रिहा किया गया कारण कानून के दायरे में नही है …! 】

जज साब ये कहते आप प्रतिभा हैं राज्य की
आप भविष्य है ओर पूंजी प्रान्त की

ओर ऐसे में जांच बलात्कार की पूरी है
जाहिर है ऐसे में सबूतों से छेड़ नहीं होनी है

तो ऐसे में एक प्ररिभा को कैद रखना सही नही है!
अंतिम न्याय हो तब तक जमानत जरूरी है !

क्या तर्क के नाम कुतर्क विद्वान जज साब का अपनी बाती
ओर अपराधी को जमानत दे दी जाती !

देश भारत लंबित न्याय के लिए मशहूर
वैसे न्याय का लंबा होना कई मायने सजा भरपूर

यानी स्पष्ट है आपको बलात्कार की छूट है !
जब तक आप न्याय प्रक्रिया से लंबित हैं !

हां यदि आप होनहार हैं तो न्याय महरबान है!
ओर उत्सव जैसा कदम उठाने कद्रदान है !

“उत्सव कदम” वास्तव में
जो पढ़ता है है बीटेक छात्र
तो जाहिर प्रतिभा ही नही मात्र

मान ले उसे बेजोड़ प्रतिभा सम्पन्न
यानी असम राज्य नही हो विपन्न

आरोप “कदम” पर साबित भी
सारे साक्ष्य भी पुख्ता उस आरोपी

आरोप संगीन यानी बलात्कार
जुर्म साबित न्याय की चीत्कार

जो साबित हो जाय तो फांसी बेलगाम
लेकिन उसमें रेयरेस्ट हो काम मकाम

हां दुर्लभ से दुर्लभतम होना जरूरी है
यानी स्पष्ट रूप से जिस्मनोशी हुजूरी है

के जेवरो से दुर्दांत कृत्य भी हो
ओर उसमें पीड़िता लाइलाज ही हो

यानी बलात्कार ओर नृशंस कृत्य का आईना हो
ओर पीड़िता की चीत्कार में मौत का मंझर हो

ये कानून दिया निर्भया केस ने फुट कर
जिसमे दरिंदे नोचते हैं सब कुछ लूटकर

वाह कानून के क्या कहने
निर्भया बलात्कार रेयर ऑफ रेयरेस्ट !
यानी बलात्कार कर उसके जेवर को खूनी घाव दे तो ही फैयरेस्ट

यानी बलात हो पर हत्या नही
और दरिंदगी सी यातना नहीं
तो बलात्कारी को आज भी रियायत
बलात्कारी को कैद पहले सिर्फ 7 वर्ष की निहायत

लेकिन निर्भया केस ने उसूल बदले
लेकिन रेयरेस्ट के दायरे में हो
तो सज़ा फाँसी नही उम्रकैद
चाहे सामूहिक दुष्कर्म जिस्म नोशी हो
लेकिन दुर्दन्य जघन्य पीड़ा न पहुँचाई हो
तो सजा में रियायत
छूटे फिर करे निहायत

पीड़ा और लाइलाज की स्तिथि
ओर सब प्रयासों के बावजूद मृत्यु
मुकदमा लंबा चलता है
राष्ट्रपति से मृत्युदंड माफ़ क्रम चलता है

लेकिन निर्भया जग जाहिर मामला था
जिसके पीछे सोशल मीडिया और आंदोलन गरमाया था
कैसे माफ़ कर देते सो
याचिका खारिज होना ही था
ओर भारत वर्ष ने देखी तीन दरिंदो की फांसी
सभ्य समाज सब खुश देश हुवा राजी

लेकिन जेल में जिये पूरे दस साल
कानून के विलम्ब ओर पेचो का जाल

पीड़िता के अभिभावक हैरान परेशान
पेशियों पर पेशियां यानी तारीख पर तारीख
लेकिन अन्तोगत्वा मिला न्याय

लेकिन ऐसे अपराध फिर भी थमे नही
दुर्दन्य अपराधी फिर भी सहमे नहीं

शारीरिक आकषर्ण प्राकुतिता
यौनाकर्षण कुदरती आईना
यानी इसमे छूट की गुंजाइश
इसमे किसका क्या जाता है पैदाइश
चर्म से चर्म का मिलन-
रगड़ क्या बिगड़ता है
जिस्म झूठा इसको पावनता से क्यो जोड़ना है

यही सोच रही है मर्दाना समाज की
लेकिन खुद की बेटी,बहु पत्नी के लिए नहीं

लेकिन जिस पर बीतती है,
पीड़ा उसी को ही होती है

जिस्म मिलन दो की सहमति अनिवार्य
लेकिन “उत्सव ” बढ़ा मनाने उत्सव बेपरवाह

ओर देखे जज साहब के अपने न्याय
हां कानून से परे आरोप अमान्य
लेकिन मुक्त कर दिया जाता है
ओर कारण क्या बताया जाता है
की छात्र राज्य का भविष्य ओर युवा है
अतः ये अपनी तरह का फैसला है

यानी हर प्रतिभावान व्यक्ति कर सकता है,
क्या..? बलात्कार,बलात्कार,
यौनाचार
ये बड़ा हास्यास्पद निर्णय अनाचार

ये न्याय के नाम पीड़िता के साथ है अन्याय
कहा है महिला आयोग और उसके पैरोकार

आंदोलित हो और फैसला बदलवाये
नही तो कालेज परिसर में होंगी कई ज्यादतियां
ओर छूट जायेगे बलात्कारी उस तर्ज पर सहज बेलगाम
यानी जमानत कानून के साये
की वे देश का भविष्य है
प्रतिभाशाली ओर है युवा

उस पीड़िता के मर्म को कौन समझे !
उसकी अस्मत लूटी कौन शादी करे !
महान जज साब अजित बोरठाकुर क्या खुद आगे आएंगे !
क्या है अगर पुत्र तो बहु बनाएंगे ?
नही है तो क्या अपने किसी रिश्ते- नाती से नाता जुड़वाएँगे !
लेकिन ऐसा होता है तो भी अन्याय है !
क्योकि जीवनसाथी उसकी पसंद से बेजार है !
फिर गहन मानसिक यातना का वो शिकार हैं!
वो भी बड़ी होनहार है प्रतिभावान है !
उस्की प्रतिभा का क्या ?
उसके सपनो का क्या ?
उसकी सामाजिक इज्जत का क्या ?
उसके परिजन की इज्जत का क्या ?
क्या अब वो उस लय में लौट पाएगी !
ओर कही गर्भवती बन गयी तो क्या ?
क्या वह गर्भपात कराएगी !
कराएगी तो क्या एक जुर्म उससे नही होगा ?
क्योकि उस आने वाले शिशु का तो कोई कसूर न होगा !
ओर पालेगी तो अनमना अनचाहा बच्चा !
ओर फिर ऐसे में उससे ब्याह कौन रचायेगा ?
ओर रचा भी ले उदार गंभीर व्यक्ति !
क्या वह औरत जिंदगी भर उस दर्द को भुला पाएगी ?
नही,कभी नहीँ ये न्याय सवालों के घेरे मे है
इस पर पुनर्विचार होना चाहिए
ऐसे निर्णय पर सत्ता संज्ञान ले
बस यही गुहार है
ओर ऐसा हो तो उस पीड़िता के साथ
भौतिक ही सही पर न्याय है!
*NK सनातन