~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

भ्रम अच्छा है कि राज हमारा है

भ्रम अच्छा है कि राज हमारा है !

क्या फक्र है क्या शुक्र है
क्या….??????
ये की हमे लड़ना नही पड़ रहा-आजादी के लिए !
न लड़ना पड़ रहा
न ही मरना पड़ रहा
न ही पीड़ित-शोषित
ओर न झुंझना पड़ रहा
किसी दुश्मन से शत्रु से
आतंकी से, आतताई से
क्योकि जो चुनोती थी
स्वीकारी ओर पाटी हमारे पुरखों ने
वो लड़े ,पीले ,मरे और मारे
ओर तोड़ दी गुलामी की जंजीरे !

हम ऋणी हैं, कृतज्ञ हैं
उन जज्ब महापुरुषों के
उन स्वतंत्रता सेनानियो के
उन आंदोलनकारियों के
उन क्रांतिकारियों के
उन बलिदानी वीरों के
उन देश की स्वतंत्रता के दीवानों के !

हम लोकतंत्र के अग्रणी
ओर स्वाधीन देश के जने
ओर गनीमत की नही तालिबानी हुकूमत

है सरकार पूर्णतः लोकमत

आज़ादी ,लोकतंत्र छिनने का डर नही
संशय नही ,शुबा नहीं

क्योकि लोकतंत्र गहराया है जानते सभी

सरदार भगत सिंह कहते हैं
नस्ल,रंग,जाति,भाषा ,धर्म
भुला दो,

ओर जतन करो कि एकमत हो जाये
सब भेद-विभेद भुला दो मैं “सनातन” कहता
रुतबा,पद, भौतिक प्रकति के भेद भुलाकर
एक जुट हो जाओ
एकमेव हो जाओ
ओर सरकार की ताकत ले लो अपने हाथों में
वो कहते की यत्न करो
की खुद का राज पा लो

ओर ढाई सो साल के कड़े संघर्ष बाद
बिखरा टूटा रियासतों रजवाड़ो में

आपस मे लड़ता झगड़ता टूटता तोड़ता

काल स्वभाव प्रयास

लेकिन लौहपुरुष की कूटनीति

सारे राज वंश झुके
ओर अब देश भारत बना
इससे पहले देश तो था
जहां चक्रवर्ती सम्राट हुवे
दूर-दूर तक साम्राज्य विस्तार के चर्चे रहे
सिमटना कभी, कभी फैलना रंग-रूप रहे
आर्यावृत के बड़े डंके रहे
रघु हुवे ,अज हुवे ,भरत हुवे
हरीश चंद्र हुवे, पुरु, हर्ष,अशोक चंद्रगुप्त हुवे
कनिष्क,बिम्बिसार समुद्रगुप्त हुवे
ओर आखरी राजवंशी परत पृष्टभूमि में
पृथ्वीराज चौहान द्वितीय हुवे
लेकिन जयचंद की जलन
ओर महत्वकांक्षा अहम
हाय खुद ने खुद का बिगाड़ा भारत भाग्य
ओर विडंबना की
लुटेरे हुवे दिल्ली के राजे

यानी तब देश भारत का था सुदूर साम्राज्य विस्तार
तो देश के ही लोग थे
आपस मे लड़ना रियाया के लिए
लूटना रियाया के लिए
बस धर्म था
उन्हें आक्रांता विदेशी कहना फिजूल था
कंधार से सुमात्रा बाली जावा
चारो तरफ था हिन्द सनातनी जलवा

राजतंत्र के सुर-असुर
जो भी जीते प्रजा के लिए वही मित था
कोई भी सुरक्षित नहीं था
कुछ भी स्थायि नही था
आज राणा तो कल पूंजा का आधिपत्य था
बस राजतंत्र का ही बोलबाला था
वैशाली ओर कुशीग्राम में जनपद का बोल था
ओर तदन्तर वही विश्व जन की आवाज़ बना
इंग्लैंड में क्रॉमवेल ने चर्च ओर राज तंत्र उखाड़ फेंका
ओर इस कड़ी से आधुनिक लोकतंत्र का सूत्रपात हुवा
फिर अमेरिका लोकतंत्र का बना प्रहरी
ओर दुनिया में प्रजातंत्र की नींव उठी

ले लो राज अपने हाथों में
चलो जनतंत्र अपना ले लिया
लेकिन सिद्धांत में ये श्रेयस्कर है
व्यवहार में त्रासदी पीड़ा
हुक्मरान सब इक जैसे
हमारे चुने हमारे बनाये हमारे दुश्मन
हाय प्रजातंत्र का ये श्याम आईना
देश चलता पूँजी पतियों से
क्योकि राजदलो के लिए चुनाव लड़ना पहला पचड़ा
जिसमे प्रचुर धन पहला फंडा
एक सामान्य आदमी सिर्फ वोट दे सकता है
चंदा नही
ओर बॉप बड़ा न भैया
बट द व्होल थिंग इस देट सबसे बड़ा रुपया
तो निचोड यही इस दलील का तकरीर का
की कहने को राज जनता का
लेकिन चुनने के बाद सब कुछ सरकारी
कुछ नही जनता का
प्रजातंत्र में एक दूसरे को आजमाने ही वोटर्स की नियति
एक ही इट के सब चट्टे बट्टे
वोट दो नोटा दो बहुमत का लोकतंत्र
सरकार चुननी ही है
कुल मिलाकर प्रजातंत्र खुद की चुनी गुलामी
बेगानी होकर भी लगती अपनी है
है ये एक ब्याहता बेटी सी
ससुराल है चाहे मायके अपनी होकर भी पराई है
*nk सनातन