हर मंदिर पर भीड़ क्यो इकट्ठा की जाती है
शाही दर्शन का चलन क्यो
रात-दिन मंदिर रहे खुले क्यो नहीँ रहते हैं
बात रूप-श्रृंगार की तो
जो खुद रूप श्रृंगार का पर्याय
उसे इसकी कहाँ जरूरत
ये महज़ व्यावसायिक चलन है
ये रुकना चाहिए
भक्त परेशान
भीड़भाड़,अफरातफरी ओर अकारण कारण बन असामयिक मौत,त्राहिमाम ,क्षोभ्, विलाप
दर्शन जब काल , दाह बन जाये
भगवान ये तो कतई नहीं चाहते
हे मानव है ये तेरी व्यवस्था ,भूल अव्यवस्था
ओर मुझे कोसना
ओर कहना
हे भगवान ये तेरा कैसा इंसाफ है
ये क्रूरता ये निर्ममता
कहा तक ठीक है
ठीक है पर पूछ खुद खुद से
क्रूरता, निर्ममता में तू क्या मुझसे कम है
तेरी क्रूरता निर्ममता प्रत्यक्ष है
मुझ पर तेरा ये इल्ज़ाम सरासर असत्य है
मैं तुझसा नहीं
तुझमे ओर् मुझमें बड़ा फर्क है
तू देव-दानव का मिश्रण
जबकि मैं सिर्फ़ ईश्वर
सब देवत्व सा सम हूँ।
*nk सनातन