सशुल्क अर्थी उठवाओ संस्थान !

सशुल्क अर्थी उठवाओ संस्थान !

■●सशुल्क अर्थी उठवाओ नेशनल आर्गेनाईजेशन ●■
मृत्यु या के मौत या के अवसान या देवलोकगमन
या परलोकगमन या इंतकाल या डेथ ,
डिमाइज बस शब्दो का फेर परिणाम सब शब्दो का एकमेव यानी एक । मृत्यु इस सांसारिक जगत का शाश्वत सत्य है ! जो इस दुनिया मे आया है उसे देर-सवेर जाना ही है इस दुनिया ऐ फ़ानी से!
मौत के कई कारण ज्ञात-अज्ञात हो सकते हैं। मौत किसी न किसी निमित्त आनी है और कोई नहीं बच सकता रंक हो या राजा उसे जाना ही है एक ना एक अनजाने दिन ! मौत दो प्रकार की होती है एक सामयिक एक असामयिक ! सामयिक यानी एक अच्छी-खासी लंबी जिंदगी स्वस्थ-अस्वस्थ अलग बात है यानी 80 -90 साल जो बहुत कम लोगों को नसीब होती है ! असामयिक मौत जो समय से पहले आये यानी अचानक आये । व्यक्ति की समान्यतम उम्र महाऋषि मनु महाराज के अनुसार 100 वर्ष यदि वैदिक साहित्य में उद्धत बात का जिक्र करें। लेकिन तब माहौल,समाज-संस्कृति ,मानसिकता में भौतिकता शुन्यतम स्तर पर थी और लोग हस्ट हष्ट-पुष्ट होते थे और बीमारियां जो थी ला इलाज थी लेकिन लोग न्यूनतम स्तर पर रूग्ण होते थे! आज लगभग सभी बीमारियों के इलाज हैं सिवाय कुछ केंसर के हालांकि उनका भी इलाज कर जीवन कुछ दूरी तक खिंचा जा सकता है ! लेकिन मौते तब भी हो रही हैं सामयिक-असामयिक रूप से ! भैतिक जीवन ने इस बारे में अपनी अलग ही भूमिका निभाई है। मधुमेह, मोटापा,बीपी आदि आम रोग हो गए
हैं ।
इस भूमिका के जानिब मैं मूल विषय पर आता हूँ। हिन्दुस्तान में किसी व्यक्ति की मौत पर पूरी धार्मिक प्रक्रिया-रस्म से दाह या अंतिम संस्कार किया जाता है इसलिए यहां इसके लिए विशेष दुकानें हैं! दुकानों पर साफ लिखा हुवा है-“यहां मौत का सामान मिलता है” ! या फिर यहां अंतिम संस्कार का सामान मिलता है कुल मिलाकर बात एक ही है । तो मैं बात कर रहा हूँ कि आज भौतिक जीवन मे व्यक्ति अधिकतम व्यस्त हो व्यावसायिक हो गया है और अधिक महत्वाकांक्षी भी! भैतिक सुख-सुविधा ही उसका अंतिम लक्ष्य ! ऐसे में सामाजिकता घटती जा रही है । पहले समाज मे पंगत यानी बैठ के खाना खाया जाता था , समाज के लोगो द्वारा ही परोसा-बनाया जाता था लेकिन अब ये प्रथा अपने शुन्यतम स्तर पर है। प्रीतिभोज बफर डिनर में,छोटे-मोटे खाने सेल्फ सर्विस यानी बुफे डिनर!
किसी को फुर्सत नही,कोई झुकना नही चाहता फिर हर कोई किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त,फिर अहम,घमंड,दम्भ। इसलिए पैसा फेको तमाशा देखो गणि सारा काम दाम चुकाउ यानी पेड़ सर्विस। तो ये बात मौत-मरण में भी देखी जाती है । बस एक-दो लोग ही कंधा दे रहे हैं अर्थी को वो भी मजबूरी से। और व्यक्ति ध्यान रखता है कि साला नाम के लिए आया था उसने कंधा नही दिया हम क्यो दे यानी श्मशान पर भी बदला चुकाया जाता है !
तो जिस परिवार में मौत हुई है उसकी अर्थी सजाने-उठाने ओर श्मशान तक पहुंचाने का काम हमारी उपर्युक्त संस्था पूरी शिद्दत और धर्म पूरक करेगी और उस कर्म का इतना चार्ज लगेगा । बस घराती का काम सिर्फ रोना,शोक मग्न ओर रिश्ते-नाती,पड़ोसी,
परिचित, शुभचिंतको को अटेंड करना! हमारे विभाग मे सभी आवश्यक कर्मचारी हैं ,जैसे- 100 पंडित, 200 अर्थी ढोहक, 100 अर्थी के लिए काठ शैया सर्जक,वीडियो ग्राफर,फोटोग्राफर, रसोइए आदि । इस तरह हम समाज सेवा करते हैं और रोजगार भी पाते हैं । जो हमारी मदद लेते हैं उन्हें किसी भी व्यक्ति से औपचारिक ओर शारिरिक श्रमवाले रिश्ते निभाने की जरूरत नही बस आत्मीय रिश्ते निभाये ओर ऐसे नाज़ुक ओर शोकमय वातावरण में महज अपनी शारिरिक उपस्थित दे !
*nk सनातन
PREVIOUS POST

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

Leave a Comment

Keep reading

You may also like

बेवफ़ा वक़्त Hindi

बेवफ़ा वक़्त

काश के रंग चढ़ा के तुमने बदस्तूर रंग बदले ना होते दुनिया के लिए फ़िक़्र थी इतनी तुम्हे तो बेख़ौफ़ बाहों में…

June 28, 2026 Read →